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Rahu retrogrades in Mrigashira

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According to True node system today Rahu will retrograde into Mrigashira & will stay until Feb 13, 2021. Mrigashira is the star of Mars. It is formed by the three faint stars at the head of the constellation Orion.Searching for something is the charecteristic of this star. Rahu is the significator of research. So a new invention ( here vaccine) may be discovered (positive thinking is good for mankind). Rahu in a mars ruled Nakshatra can pervert the energy and increase violence, aggression , anger and lack of patience, sensitivity . This will come out more when Mars will transit into Aquarius( 4th May 2020 at 09 : 04 p.m. - 18th June 2020 08: 41 p.m) I think this negativity will be realised strongly if lock down doesn't get released. As per mean mode system Rahu will change its star May 20 , 2020 & stay until Jan 26 2021. So let's watch the results of Nakshatra transit of Rahu according to both true & mean node system. Be positive and think positive. In the name of Supreme Lord Achariya Vaswati

References

Rahu retrogrades in Mrigashira
posted Apr 23, 2020 by Vaswati Baksiddha

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जन्म कुंडली में चौथे घर को चतुर्थ भाव कहा जाता है । इसके स्वामी को चतुर्थेश कहते हैं । चतुर्थ भाव से माता , भूमि , भवन , जमीन - जायदा , वाहन सुख , घरेलू सुख , जन्म स्थान से दूर निवास , जन सेवा , सीने (छाती ) से संबंधित बीमारी के बारे में विचार किया जाता है । चंद्रमा , बुध एवं शुक्र को इसका कारक ग्रह माना जाता है । जब कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी , चतुर्थ भाव एवं इसके कारक चंद्रमा पीड़ित हो जाते हैं तो इस भाव से संबंधित समस्या ज्यादा होती है । मन में भय भी बना रहता है । घरेलू सुख में अशांति बानी रहती है । यदि चतुर्थ भाव , चतुर्थेश , चंद्र तथा कर्क राशि इन सब पर पाप प्रभाव पड़ रहा हो तो ऐसे में छाती के रोग जैसे निमोनिया खासी तपेदिक आदि होने की संभावना रहती है । चतुर्थ भाव पर राहु केतु जैसे क्रूर ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो या वहां विराजमान हो तो ऐसे व्यक्ति को मातृभूमि का वियोग सहना पड़ता है मतलब उनको जन्म स्थान से दूर निवास करना पड़ता है । शनि राहु के साथ द्वादशेश का भी प्रभाव हो तो ऐसे व्यक्ति को बार-बार अपना रहने का स्थान बदलते रहना पड़ता है । यदि सरकारी कर्मचारी हो तो अधिक तबादलों का सामना करना पड़ता है । चतुर्थ भाव के साथ शुक्र भी पीड़ित हो या कमजोर हो तो वाहन का पूर्ण सुख प्राप्त नहीं होता है । चतुर्थ भाव सर्वजन का भाव होता है किसी भी व्यक्ति को जनता का प्रिय नेता बनने के लिए चतुर्थ भाव की स्थिति ठीक होनी चाहिए । चतुर्थ भाव चतुर्थेश एवं चंद्र के साथ लग्नेश की युति अथवा दृष्टि संबंध हो एवं चतुर्थ भाव बलवान तथा शुभ दृष्ट हो तो व्यक्ति सार्वजनिक कार्यों में भाग लेने वाला जनप्रिय व जनहितकारी नेता होता है । ( सिर्फ इस योग के कारण कोई राजनेता नहीं बन सकता है यह सिर्फ जनता से लगाव का भाव है। )
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image

 

 

 

Hora Divisional chart

The HORA chart is extension of 2nd house and is studied to assess the wealth, prosperity, happiness, intelligence, power to discriminate, face, food, behavior, relations with other members of family and other 2nd house significations. 

The day half is controlled by sun indicating courage and the night half moon indicating compassion and luck. 


***************************************

Important points

--The strength of 2nd lord and its Placement in Sun/ Moon hora becomes important. 

-- If the hora Lagna belongs to sun native earns wealth in his own country. 

-- If Hora Lagna belongs to moon native earns wealth in far away from birth place. 

-- If Hora Laganesh Sun or Moon is a strong and well placed in natal chart, the native will be Virtuous, intelligent, brave, well behaved and will be rich happy and prosperous. 

-- If 
..... sun is in moon's hora 
or 
...... moon is in sun's hora 
then native will be rich and prosperous. 


*******************************************************************************
Karaks of second house
-- Jupiter is karka of financial gains. 
-- Venus is general karka of wealth.

 

 

Regards

 

Astrologer AarchKrishna

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1.अश्विनी (Beta Arietis)

नक्षत्रों में प्रथम अश्विनी नक्षत्र के देवता देवचिकित्सक अश्विनी कुमार हैं। यह घोड़े के मुख के आकार का तीन तारों का पुंज है। 

यह लघु, क्षिप्रसंज्ञक तथा तिर्यकमुख है।

 इसमें 30 मुहूर्त होते हैं। इसे पुल्लिंग माना जाता है तथा इसे यंत्र, मशीनरी, रसायन, कल-कारखाने, यात्रा, कम्यूनिकेशन, कम्प्यूटर, 

औषधि संबंधी कार्यों को करने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।

2.भरणी (Arietis)

योनिसदृश आकार वाले भरणी नक्षत्र के देवता यमराज है। इसमें दो तारे होते हैं। अधोमुख वाला भरणी नक्षत्र 15 मुहूर्त का होता है 

व पुल्लिंग नक्षत्र है। उग्र व क्रूर होने के कारण इसमें शुभ कार्य वर्जित बताए गए हैं। इन नक्षत्र में आखेट कर्म, अंतरिक्ष से धरती पर प्र

हार करने वाले अस्त्र आदि के प्रयोग सफल होते हैं।

3.कृत्तिका (Eta Tauri)

यह नक्षत्र तीस मुहूर्त का होता है व इसके देवता अग्निदेव है। इसे सूर्य का नक्षत्र भी कहा जाता है। अधोमुख वाला कृत्तिका नक्षत्र 

पुल्लिंग माना जाता है तथा क्षुरिका के आकार का दिखाई देता है तथा स्वभाव से साधारण व मिश्र संज्ञावाला है। इसमें सामान्य कार्य 

यथा फसल की बुवाई, कटाई, मड़ाई, यज्ञ-हवन का प्रारंभ, 

अग्निस्थापन का कार्य आदि करना शुभ माना गया है।

4.रोहिणी (Alpha Tauri)

पांच तारों को यह नक्षत्र पुंज आकाश में लंबे त्रिभुज (बैलगाड़ी के ढांचे) के समान दिखाई देता है। यह पुल्लिंग नक्षत्र ध्रुव तथा स्थिर प्रकृति

 वाला व ऊर्ध्वमुखी है। इस नक्षत्र के स्वामी ब्रह्मा है। रोहिणी नक्षत्र को शुभ मानकर इसमें समस्त मांगलिक कार्यों को करने की आज्ञा 

दी गई है। साथ ही मंदिर, भवन, किले, मीनारें, छत्र आदि बनवाने, तारों संबंधी कार्य करने, वायुयान उड़ाने संबंधी कार्य भी शुभ बताए गए हैं।

5.मृगशिरा (Lambda Orionis)

इस नक्षत्र के स्वामी चन्द्रदेव है। यह आकाश में तीन तारे (जो मृगों के सिर की भांति दिखाई देते हैं) का समूह है। 

30 मुहूर्त वाला मृगशिरा नक्षत्र मृदु तथा मैत्री स्वभाव वाला तिर्यक मुख है। इस नक्षत्र में हाथी, घोड़ा, वाहन, खेती, नौकाविहार, खेल,

 वन तथा पौधों आदि से जुड़े कार्यों का करना शुभ माना जाता है।

6.आर्द्रा (Alpha Orionis)

तीक्ष्ण तथा दारूण स्वभाव वाला आर्द्रा नक्षत्र ऊर्ध्वमुखी है। यह स्त्रीलिंगी तथा विषैला नक्षत्र है। आर्द्रा नक्षत्र में विषाक्त प्राणियों तथा 

विष संबंधी कार्यों से दूर रहने की आज्ञा दी गई है। इसमें शुभ कार्य करने की मनाही की गई है।

7.पुनर्वसु (Beta Geminarium)

45 मुहूर्त वाला पुनर्वसु नक्षत्र 4 तारों का समूह है जो घर के आकार में दिखाई देता है। यह स्त्रीलिंगी नक्षत्र है जिसकी स्वामिनी देवमाता अदिति हैं।

 यह चर प्रकृति वाला शुभ नक्षत्र माना गया है जिसमें मांगलिक कार्य यथा गृहनिर्माण, वास्तुकर्म, नववधू प्रवेश, नए कार्य आरंभ करना

 शुभ तथा सौभाग्यदायी माना गया है।

8.पुष्य (Delta Cancri)

यह 30 मुहूर्त वाला स्त्रीलिंगी, लघु-क्षिप्रसंज्ञक तथा ऊर्ध्वमुखी नक्षत्र है। पुष्य नक्षत्र के स्वामी देवगुरु बृहस्पति है। गुरुवार तथा रविवार 

को पुष्य नक्षत्र होना अत्यन्त शुभ माना गया है। 

इस नक्षत्र में विवाह को छोड़कर अन्य सभी शुभ व मांगलिक कार्य करना उत्तम बताया गया है। परन्तु यदि शुक्रवार को पुष्य नक्षत्र हो 

तो उस समय उत्पात योग बनता है जिसमें कभी भी कोई भी शुभ कार्य आरंभ नहीं करना चाहिए।

9. Aश्लेषा (Epsilon Hydrae)

श्लेषा नक्षत्र को आश्लेषा नक्षत्र भी कहा जाता है। यह तीक्ष्ण, दारूण तथा अधोमुख माना गया है जिसमें खेती संबंधी शुभ कार्य किए जा सकते हैं

 परन्तु अन्य कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। श्लेषा नक्षत्र का स्वामी सर्प है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले बच्चों के लिए शांति कर्म करवाना 

चाहिए।

10.मघा (Alpha Leonis)

स्वभाव से क्रूर मघा नक्षत्र 30 मुहूर्त वाला तथा स्त्रीलिंगी नक्षत्र है। मघा को क्रूर व उग्र प्रकृति वाला तथा अधोमुखी माना गया है। 

यह विष नक्षत्र है जिसके स्वामी पितृ हैं। इस नक्षत्र में विवाह, खेती, वृक्षारोपण, बाग-बगीचे संबंधी कार्य करना उत्तम बताया गया है 

परन्तु अन्य शुभ कार्य नहीं किए जाते। यह गण्डान्त नक्षत्र है, अतः इसके प्रारंभ की तीन घटी में कोई भी मांगलिक कार्य नही किया जाता है।

11.पूर्वाफाल्गुनी (Delta Leonis)

दो तारों से बना और खाट के आकार वाला पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र उग्र व क्रूर प्रकृति वाला अधोमुखी नक्षत्र है जिसमें 30 मुहूर्त होते हैं। 

इसके स्वामी भग देवता हैं। इस नक्षत्र को गणित, व्यापार संबंधी, खान खोदने संबंधी, कुंआ खोदने संबंधी, जमीन से जुड़े कार्य, 

भवन निर्माण कार्य आदि करने के लिए शुभ बताया गया है। प्राचीन काल में एक ही फाल्गुनी नक्षत्र माना जाता था जो कालान्तर में 

दो माने जानने लगे।

12.उत्तराफाल्गुनी (Beta Leonis)

इस नक्षत्र में भी दो ही तारे हैं। इसका आकार पर्यंक के समान है। स्त्रीसंज्ञक उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र 45 मुहूर्त वाला ऊर्ध्वमुखी, ध्रुव 

तथा स्थिर प्रकृति का नक्षत्र है। 

यह विवाह सहित सभी कार्यों विशेष रूप से विद्यारम्भ तथा विद्यासंबंधी कार्यों के लिए उत्तम माना गया है। इस नक्षत्र में कथा-प्रवचन, 

वास्तुकर्म, कुआं खोदना, पुस्तकालय, विद्यालय, प्रशिक्षण आदि कार्यों के लिए शुभ बताया गया है।

 

 

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पौराणिक कथाओं के अनुसाक एक समय सूर्यदेव जब गर्भाधान के लिए अपनी पत्नी छाया के समीप गए तो छाया ने सूर्य के प्रचंड तेज से भयभीत होकर अपनी आंखें बंद कर ली थीं। कालांतर में छाया के गर्भ से शनिदेव का जन्म हुआ। शनि के श्याम वर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर यह आरोप लगाया कि शनि मेरा पुत्र नहीं है तभी से शनि अपने पिता सूर्य से शत्रुता रखते हैं। शनिदेव ने अनेक वर्षों तक भूखे-प्यासे रहकर शिव आराधना की तथा घोर तपस्या से अपनी देह को दग्ध कर लिया था, तब शनिदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने शनिदेव से वरदान मांगने को कहा। शनिदेव ने प्रार्थना की- युगों-युगों से मेरी मां छाया की पराजय होती रही है, उसे मेरे पिता सूर्य द्वारा बहुत अपमानित व प्रताड़ित किया गया है इसलिए मेरी माता की इच्छा है कि मैं (शनिदेव) अपने पिता से भी ज्यादा शक्तिशाली व पूज्य बनूं। तब भगवान शिवजी ने उन्हें वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा स्थान सर्वश्रेष्ठ रहेगा। तुम पृथ्वीलोक के न्यायाधीश व दंडाधिकारी रहोगे। साधारण मानव तो क्या- देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर और नाग भी तुम्हारे नाम से भयभीत रहेंगे। ग्रंथों के अनुसार शनिदेव कश्यप गोत्रीय हैं तथा सौराष्ट्र उनका जन्मस्थल माना जाता है। • ज्योतिष के अनुसार सूर्य पुत्र शनिदेव को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं कि वह गुस्सेल, भावहीन और निर्दयी हैं। • शनिदेव न्याय के देवता हैं। आपको जानकर हैरानी भी होगी कि जिस शनि के प्रकोप से दुनिया डरती है वह भी इन देवी-देवताओं से डरते हैं। • शनि महाराज को जिनसे डर लगता है उनमें एक नाम तो हनुमान जी का है। कहते हैं हनुमानजी के दर्शन और उनकी भक्ति करने से शनि के सभी दोष समाप्त हो जाते हैं और हनुमान जी के भक्तों को शनिदेव परेशान नहीं करते। • श्रीकृष्ण, शनि महाराज के ईष्ट देव माने जाते हैं। इनके दर्शन के लिए शनि महाराज ने कोकिला वन में तपस्या की थी। यहीं कोयल रूप में श्रीकृष्ण ने शनि महाराज को दर्शन दिए थे और शनि महाराज ने कहा था कि वह कृष्ण भक्तों को परेशान नहीं करेंगे।
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