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SOURCE #OF #MONEY

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Astrologer in India
posted Jun 12, 2020 by Rakesh Periwal

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कॅरियर चयन में विचारणीय भाव जन्मपत्रिका से आजीविका निर्णय की बात आते ही सहसा ध्यान कुण्डली के कर्म भाव की ओर आकृष्ट हो जाता है| मस्तिष्क दशम भाव तथा दशमेश की स्थिति को परखने लगता है| अन्तत: परिणाम यह निकलता है कि मस्तिष्क किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँच पाता है, क्योंकि दशम भाव तथा दशमेश जिस कार्यक्षेत्र को बता रहे हैं, उक्त व्यक्ति का कार्यक्षेत्र उससे भिन्न है| ऐसा अनुभव जीवन में अनेक जन्मपत्रिकाओं का अध्ययन करने पर मिलता है| वास्तव में कॅरियर का विचार सिर्फ कर्म भाव से नहीं किया जा सकता है| दशम भाव व्यक्ति के परिश्रम तथा कर्म को दर्शाता है| उस कर्म से मिलने वाले फल को तथा धनागम को द्वितीय तथा लाभ भाव दर्शाते हैं| कर्म करने के लिए व्यक्ति में सामर्थ्य होना चाहिए| उसी सामर्थ्य से कोई भी जातक कर्म करता हुआ आजीविका प्राप्त करता है, अत: व्यक्ति के सामर्थ्य को लग्न भाव दर्शाता है| उपर्युक्त तथ्यों को समझते हुए ही प्रसिद्ध ज्योतिर्विद् कल्याण वर्मा ने अपनी प्रसिद्ध रचना सारावली के ३३वें अध्याय के अन्तर्गत अन्तिम श्‍लोक में धन- लाभ विचार की पद्धति बताते हुए लिखा है कि लग्न, द्वितीय तथा लाभ भाव में स्थित ग्रहों से अथवा इन भावेशों से धनलाभ का विचार होता है| आचार्य वराहमिहिर बृहज्जातक में लिखते हैं कि इन भावों में शुभ ग्रह हों, तो सरलतापूर्वक धनलाभ होता हैतथा पापग्रह हों, तो परिश्रमपूर्वक धनलाभ होता है| गार्गी कहते हैं कि इन भावों में ग्रह न हों, तो राशि की शुभाशुभता एवं ग्रहों की दृष्टि से धनलाभ का विचार करना चाहिए| उपर्युक्त शास्त्रीय प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि आजीविका विचार के लिए सिर्फ दशम भाव का ही विचार नहीं करना चाहिए| उपर्युक्त भावों के अतिरिक्त पञ्चम भाव का भी आजीविका विचार में विशेष महत्त्व है| वर्तमान समय में किसी भी नौकरी को प्राप्त करने अथवा व्यवसाय में सफल होने के लिए शिक्षा की आवश्यकता होती है| यदि व्यक्ति उच्च शिक्षा ग्रहण कर लेता है, तो उसे आजीविका निर्वहण में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होती है| इन सभी तथ्यों से यह बात सिद्ध होती है कि आजीविका विचार के लिए दशम भाव के साथ ही लग्न, द्वितीय, पञ्चम तथा एकादश भाव भी विशेष विचारणीय है| प्रश्‍न यह उठता है कि इन सभी भावों से किस प्रकार कार्यक्षेत्र का विचार किया जाए| कार्यक्षेत्र का विचार करते समय सर्वप्रथम दशम भाव तथा दशमेश की स्थिति को ही देखना चाहिए| यदि कर्मेश अथवा कर्म भाव निर्बल हो, तो व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र के लिए परिश्रम नहीं कर पाएगा| दशम भाव के पश्‍चात् लग्न भाव कर्मक्षेत्र हेतु विचारणीय द्वितीय महत्वपूर्ण भाव है| लग्न भाव से व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं रुचि को देखा जाता है| इस भाव अथवा भावेश के निर्बल होने पर व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य न होने के कारण कार्यक्षेत्र में सफलता नहीं मिलती है अथवा कई बार अपनी रुचि के अनुसार कॅरियर की प्राप्ति नहीं होती है| लग्न के पश्‍चात् द्वितीय भाव महत्त्वपूर्ण है| द्वितीय भाव से स्थायी धन-सम्पत्ति का विचार किया जाता है| साथ ही कुटुम्बजनों के सहयोग को भी देखा जाता है| यदि द्वितीय भाव अथवा द्वितीयेश निर्बल हुआ, तो व्यक्ति अच्छे कार्यक्षेत्र के होते हुए भी स्थायी धन-सम्पत्ति नहीं बना पाता है अथवा उसे अपने कौटुम्बिकजनों का सहयोग न मिलने के कारण कार्यक्षेत्र में उच्च सफलता प्राप्त नहीं होती है| द्वितीय भाव के पश्‍चात् पञ्चम भाव का भी विचार करें| पञ्चम भाव से विद्या, बुद्धि तथा आत्मविश्‍वास का विचार किया जाता है और इन तीनों के बिना कोई भी व्यक्ति श्रेष्ठ आजीविका प्राप्त नहीं कर सकता है| पञ्चम भाव अथवा पञ्चमेश निर्बल होने पर व्यक्ति अथाह परिश्रम करने के पश्‍चात् भी अपने कॅरियर में आत्मविश्‍वास की कमी अथवा विद्या अल्प रहने के कारण सफलता प्राप्त नहीं कर पाता है| पञ्चम भाव के पश्‍चात् लाभ भाव भी विचारणीय है| लाभ भाव का कॅरियर विचार में विशेष रूप से महत्त्व है| इसकी महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि यह कर्म भाव की समग्र उपलब्धि को दर्शाता है| लाभ भाव से आय के स्रोतों का ज्ञान होता है| कोई भी व्यक्ति किसी कार्य से कितना लाभ प्राप्त करेगा यह विचार इस भाव से किया जाता है| यदि किसी व्यक्ति के पास श्रेष्ठ बुद्धि है, वह आत्मविश्‍वासी है, उसे अपने कौटुम्बिकजनों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हो रहा है, वह स्वस्थ है तथा अपने कार्य के लिए अत्यन्त परिश्रमी भी है, फिर भी लाभ अथवा लाभेश के निर्बल होने पर उसे अपने कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं होगी| उपर्युक्त पॉंचों भावों का उत्तम सम्बन्ध तथा भाव और भावेशों की बली स्थिति जिन व्यक्तियों की जन्मपत्रिका में स्थित हों, उन्हें निश्‍चित रूप से श्रेष्ठ कार्यक्षेत्र की प्राप्ति होती है| यदि इनमें से कोई एक या दो भाव अथवा भावेश निर्बल हों, तो व्यक्ति के कॅरियर में उस भाव से सम्बन्धित फलों की कमी रह जाती है| जैसे; लग्न अथवा लग्नेश बलहीन होने पर व्यक्ति अपनी शारीरिक समस्याओं से परेशान रहेगा अथवा उसे अपनी रुचि के अनुसार कार्यक्षेत्र की प्राप्ति नहीं होगी| वह अन्य कार्यक्षेत्र से चाहे कितना भी धनार्जन कर ले, परन्तु उसे सन्तुष्टि प्राप्त नहीं होती| इन भावों और भावेशों का अन्य भाव और भावेशों से सम्बन्ध को समझते हुए ही किसी भी व्यक्ति के कॅरियर का निर्धारण करना चाहिए, क्योंकि इन भावों के अतिरिक्त भी शेष भावों का कॅरियर चयन में महत्त्व है| हालांकि वह महत्त्व इतना अधिक प्रभावशाली नहीं है, फिर भी कार्यक्षेत्र को ये भाव प्रभावित करते हैं| इन्हें समझने के लिए प्रत्येक भाव से सम्बन्धित फलों को जानना होगा| कार्यक्षेत्र के उपर्युक्त प्रमुख भावेश यदि किसी एक ही भाव में आकर सम्बन्ध बना लें, अथवा इनमें से कोई तीन या चार भावेश किसी एक निश्‍चित भाव से सम्बन्ध बना लें, तो जातक का कार्यक्षेत्र उसी से सम्बन्धित हो जाता है|
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उच्च सफलता के योग-

1. जन्म-कुंडली में दशम स्थान

जन्म-कुंडली में दशम स्थानको (दसवां स्थान) को तथा छठे भाव को जॉब आदि के लिए जाना जाता है। सरकारी नौकरी के योग को देखने के लिए इसी घर का आकलन किया जाता है। दशम स्थान में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति की दृष्टि पड़ रही होती है साथ ही उनका सम्बन्ध छठे भाव से हो तो सरकारी नौकरी का प्रबल योग बन जाता है। कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि जातक की कुंडली में दशम में तो यह ग्रह होते हैं लेकिन फिर भी जातक को संघर्ष करना पड़ रहा होता है तो ऐसे में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति पर किसी पाप ग्रह (अशुभ ग्रह) की दृष्टि पड़ रही होती है तब जातक को सरकारी नौकरी प्राप्ति में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अतः यह जरूरी है कि आपके यह ग्रह पाप ग्रहों से बचे हुए रहें।

2. जन्म कुंडली में जातक का लग्न

जन्म कुंडली में यदि जातक का लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृष या तुला है तो ऐसे में शनि ग्रह और गुरु (वृहस्पति) का एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होना, सरकारी नौकरी के लिए अच्छा योग उत्पन्न करते हैं।

3. जन्म कुंडली में यदि केंद्र में अगर चन्द्रमा, ब्रहस्पति एक साथ होते हैं तो उस स्थिति में भी सरकारी नौकरी के लिए अच्छे योग बन जाते हैं। साथ ही साथ इसी तरह चन्द्रमा और मंगल भी अगर केन्द्रस्थ हैं तो सरकारी नौकरी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

4. कुंडली में दसवें घर के बलवान होने से तथा इस घर पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने करियर क्षेत्र में बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने से कुंडली धारक को आम तौर पर अपने करियर क्षेत्र में अधिक सफलता नहीं मिल पाती है।

5. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य तथा चंद्र को राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य या चंद्र का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। सूर्य का प्रभाव चंद्र की अपेक्षा अधिक होता है।

6. लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य या चंद्र स्थित हो तो व्यक्ति शाषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।

7. चंद्र का दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाता है। यधपि चंद्र चंचल तथा अस्थिर ग्रह है जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार बार गुजरते है।

8. सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते है। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप चुप तरीके से कार्य करने वाले होते है।

9. सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा प्राप्त होता है।

10. यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध बैंक या इंश्योरेंस, गुरु- शिक्षा सम्बंधी, शुक्र फाइनेंश सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।

11. सूर्य चंद्र का चतुर्थ प्रभाव जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते है।

12. सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। दशम स्थान कार्य का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।

13. यदि किसी जातक की कुंडली में दशम भाव में मकर राशि में मंगल हो या मंगल अपनी राशि में बलवान होकर प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम या दशम में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

14. यदि मंगल स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो तथा दशम में स्थित हो या मंगल और दशमेश की युति हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

15. चंद्र केंद्र या त्रिकोण में बली हो तो सरकारी नौकरी का योग बनाता है ।

16. यदि सूर्य बलवान होकर दशम में स्थित हो या सूर्य की दृष्टि दशम पर हो तो जातक सरकारी नौकरी में जाता है ।

17. यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न में गुरु या चौथे भाव में गुरु हो या दशमेश ग्यारहवे भाव में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

18. यदि जातक की कुंडली में दशम भाव पर सूर्य, मंगल या गुरु की दृष्टि पड़े तो यह सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

19. यदि १० भाव में मंगल हो, या १० भाव पर मंगल की दृष्टी हो,

20. यदि मंगल ८ वे भाव के अतिरिक्त कही पर भी उच्च राशी मकर (१०) का होतो।

21. मंगल केंद्र १, ४, ७, १०, या त्रिकोण ५, ९ में हो तो.

22. यदि लग्न से १० वे भाव में सूर्य (मेष) , या गुरू (४) उच्च राशी का हो तो। अथवा स्व राशी या मित्र राशी के हो।

23. लग्नेश (१) भाव के स्वामी की लग्न पर दृष्टी हो।

24. लग्नेश (१) +दशमेश (१०) की युति हो।

25. दशमेश (१०) केंद्र १, ४, ७, १० या त्रिकोण ५, ९ वे भाव में हो तो। उपरोक्त योग होने पर जातक को सरकारी नौकरी मिलती है। जितने ज्यादा योग होगे , उतना बड़ा पद प्राप्त होगा।

26. भाव:कुंडली के पहले, दसवें तथा ग्यारहवें भाव और उनके स्वामी से सरकारी नौकरी के बारे मैं जान सकते हैं।

27.सूर्य. चंद्रमा व बृहस्पति सरकारी नौकरी मै उच्च पदाधिकारी बनाता है।

28. भाव :द्वितीय, षष्ठ एवं दशम्‌ भाव को अर्थ-त्रिकोण सूर्य की प्रधानता होने पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है।

29. नौकरी के कारक ग्रहों का संबंध सूर्य व चन्द्र से हो तो जातक सरकारी नौकरी पाता है।

30. दसवें भावमें शुभ ग्रह होना चाहिए।

31. दसवें भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ होना चाहिए।

32. पहले, नवें तथा दसवें घर में शुभ ग्रहों को होना चाहिए।

33. पंच महापुरूष योग: जीवन में सफलता एवं उसके कार्य क्षेत्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण समझे जाते हैं।पंचमहापुरूष योग कुंडली में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि अपनी स्वराशि अथवा उच्च राशि का होकर केंद्र में स्थित होने पर महापुरुष योग बनता

34. पाराशरी सिद्धांत के अनुसार, दसवें भाव के स्वामी की नवें भाव के स्वामी के साथ दृष्टि अथवा क्षेत्र और राशि स्थानांतर संबंध उसके लिए विशिष्ट राजयोग का निर्माण करते हैं।

कुंडली से जाने नौकरी प्राप्ति का समय नियम:

1. लग्न के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में

2. नवमेश की दशा या अंतर्दशा में

3. षष्ठेश की दशा या, अंतर्दशा में

4. प्रथम,दूसरा , षष्ठम, नवम और दशम भावों में स्थित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा में

5. दशमेश की दशा या अंतर्दशा में

6. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में

7. नौकरी मिलने के समय जिस ग्रह की दशा और अंतर्दशा चल रही है उसका संबंध किसी तरह दशम भाव या दशमेश से ।

8. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है।

9. छठा भाव :छठा भाव नौकरी का एवं सेवा का है। छठे भाव का कारक भाव शनि है।

10. दशम भाव या दशमेश का संबंध छठे भाव से हो तो जातक नौकरी करता है।

11. राहु और केतु की दशा, या अंतर्दशा में :

जीवन की कोई भी शुभ या अशुभ घटना राहु और केतु की दशा या अंतर्दशा में हो सकती है।

12. गोचर: गुरु गोचर में दशम या दशमेश से केंद्र या त्रिकोण में ।

13. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु एक-दूसरे से केंद्र, या त्रिकोण में हों तो नौकरी मिल सकती है

14. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि या गुरु का या दोनों का दशम भाव और दशमेश दोनों से या किसी एक से संबंध होता है।

15. कुंडली का पहला, दूसरा, चौथा, सातवा, नौवा, दसवा, ग्यारहवा घर तथा इन घरों के स्वामी अपनी दशा और अंतर्दशा में जातक को कामयाबी प्रदान करते है।

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