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विद्या विवादाय धनं मदाय खलस्य शक्तिः परपीडनाय। साधोस्तु सर्वं विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥ A rogue utilizes his education for debate(quarrel), money for pride and power for oppressing others whereas a noble utilizes his education for knowledge, money for charity and power for securing others. *दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए होती है इसके विपरीत सज्जनों की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति दूसरों की रक्षा के लिए होती है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
posted Jul 10, 2020 by anonymous

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सुखस्य दुःखस्य न कोSपि दाता परोददातीति कुबुद्धिरेषा | अहं करोमीति वृथाSभिमानः स्वकर्मसूत्र ग्रथितो हि लोक: || It is the wrong perception that pain or pleasure are provided to us by others. Pleasure and pain are not to given to us by someone else. It is equally vain glorious to claim that I am the doer of anything. The life in the world is arranged by the karmas one has practiced and is practicing. *हमारे सुख दु:ख दूसरों ने दिये है ये समझना गलत है । ये भी समझना गलत है कि मैं ही सब कार्य करता हुँ । सभी लोग अपने कर्मो के फल भुगतते हैं।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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उदये सविता रक्तो रक्त:श्चास्तमये तथा। सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥ The sun looks red while rising and setting. Great men too remain alike in both the good and bad times. *उदय होते समय सूर्य लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल होता है, सत्य है महापुरुष सुख और दुःख में समान रहते हैं॥* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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कस्यैकान्तं सुखम् उपनतं, दु:खम् एकान्ततो वा। नीचैर् गच्छति उपरि च, दशा चक्रनेमिक्रमेण॥ Who has only experienced constant happiness or constant sorrows? Situations in life are similar to a point on the moving wheel which goes up and down regularly. *किसने केवल सुख ही देखा है और किसने केवल दुःख ही देखा है, जीवन की दशा एक चलते पहिये के घेरे की तरह है जो क्रम से ऊपर और नीचे जाता रहता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते | संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते || While contemplating the objects of the senses, a person develops attachment for them, and from such attachment lust develops, and from lust anger arises *विषयों का ध्यान करने से उनके प्रति आसक्ति हो जाती है यह आसक्ति ही कामना को जन्म देती है और कामना ही क्रोध को जन्म देती है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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नात्यन्त गुणवत् किंचित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् उभयं सर्वकार्येषु दॄष्यते साध्वसाधु वा || There is no work which is good in all respects. There is no work bad in all respects. Both good and bad points are present in every work. *ऐसा कोई भी कार्य नही है जो सर्वथा अच्छा है। ऐसा कोई भी कार्य नही जो सर्वथा बुरा है। अच्छे और बुरे गुण हर एक कार्य मै होते ही है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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