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विद्या विवादाय धनं मदाय खलस्य शक्तिः परपीडनाय। साधोस्तु सर्वं विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥ A rogue utilizes his education for debate(quarrel), money for pride and power for oppressing others whereas a noble utilizes his education for knowledge, money for charity and power for securing others. *दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए होती है इसके विपरीत सज्जनों की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति दूसरों की रक्षा के लिए होती है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
posted Jul 10 by anonymous

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चन्दनं शीतलं लोके चंदनादपि चंद्रमा: | चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगत: || sandalwood is pleasant (cool), moon (or moon light) is more pleasant than sandal. (but) company of a good person (sAdhu) is pleasant then both moon and sandal. *संसार में चन्दन को शीतल माना जाता है लेकिन चन्द्रमा चन्दन से भी शीतल होता है | अच्छे मित्रों का साथ चन्द्र और चन्दन दोनों की तुलना में अधिक शीतलता देने वाला होता है |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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उद्यमेनैव हि सिध्यन्ति, कार्याणि न मनोरथै। न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मृगाः॥ Things are achieved by doing and not by desiring alone as deers by themselves don't go into a lion's mouth. *प्रयत्न करने से ही कार्य पूर्ण होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं, सोते हुए शेर के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते हैं।* *Hari Om,pranam,jai sitaram*
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न निर्मितः केन न दृष्टपूर्वः न श्रूयते हेममयः कुरङ्गः । तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ॥ Neither has one made golden deer nor has anyone seen a golden deer. Even though, Ram desired to get the golden deer. In the time of destruction the intelligence goes opposite. *स्वर्ण मृग न तो ब्रह्मा ने रचा था और न किसी ओर ने उसे बनाया था, न पहले कभी देखा गया था, न कभी सुना गया था, तब भी श्रीराम की उसे पाने (मारीच का मायावी रूप कंचन मृग ) की इच्छा हुई, अर्थात सीता के कहने पर वे उसे पाने के लिए दौड़ पड़े । किसी ने ठीक ही कहा है-"विनाश काले विपरीत बुद्धि।' जब विनाश काल आता है, तब बुद्धि नष्ट हो जाती है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि । लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति ॥ Illustrious and noble persons become firm like the 'Vajra' the weapon of God Indra and very gentle like a flower depending upon the prevailing situation. They are famous because of this special trait in them. *महान व्यक्तियों का स्वभाव अति विशिष्ठ रूप से आवश्यकता अनुसार, देवराज इन्द्र के वज्र के समान कठोर और एक पुष्प के समान हो जाता है और इसी विशिष्टता के लिये ही वे समाज में प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध होते हैं* | हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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अस्थिरं जीवितं लोके अस्थिरे धनयौवने। अस्थिरा: पुत्रदाराश्र्च धर्मकीर्तिद्वयं स्थिरम्॥ Life in this world is ephemeral, wealth and youthfulness are also ephemeral, association with son and wife is also ephemeral. Only Righteousness and Fame always remain. *इस जगत में जीवन सदा न रहने वाला है, धन और यौवन भी सदा न रहने वाले हैं, पुत्र और स्त्री भी सदा न रहने वाले हैं। केवल धर्म और कीर्ति ही सदा रहने वाले हैं।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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