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रामचरितमानस की चौपाइयां करेंगी आपकी हर मनोकामना पूरी

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जानें किस मनोकामना के लिए कौन सी चौपाई पढ़नी चाहिए जीवन में शांति ना मिल पा रही हो, या किसी सवाल का जवाब ना मिल पा रहा हो तो इंसान को रामचरितमानस का पाठ करना चाहिए, इससे मन को शांति और जीवन की हर परेशानी का हल भी मिलता है। इसके अलावा मान्यता है कि विशेष कामनाओं के लिए रामचरितमानस की अलग-अलग पंक्तियों का पाठ करना चाहिए। अगर आप नौकरी की तलाश में हैं तो आप इस पंक्ति का पाठ करें, बिस्व भरण पोषण कर जोई, ताकर नाम भरत अस होई | अगर जीवन में कोई परेशानी हो जिसका आप निवारण चाहते हो तो, इस पंक्ति का जाप करें, जपहि नामु जन आरत भारी, मिटाई कुसंकट होई सुखारी | अगर ज्ञान अर्जित करना चाहते हैं तो, उसके लिए इस पंक्ति का जप फलदायी रहेगा, गुरु गृह पढ़न गए रघुराई, अलप काल विद्या सब आयी | अगर विवाह से संबंधित कोई बात बाधा बन रही है, या फिर सुयोग/मनचाहा वर चाहिए तो, उसके लिए इस पंक्ति का जप करें, सुनु सिय सत्य असीस हमारी, पूजहि मनकामना तुम्हारी | अगर किसी बीमारी या रोग से ग्रस्त हैं और उससे मुक्ति पाना चाहते हैं तो, इस पंक्ति का जप करना आपके लिए श्रेष्ठ रहेगा, दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, राम राज नहीं काहूंहि व्यापा | अगर जीवन में निराशा से घिर रहे हों, या ऐसा लगने लगे कि सभी रास्ते बंद हो रहे हैं तो मन की शांति और जीवन में उचित मार्गदर्शन के लिए इस पंक्ति का नियमित जप करें, दीन दयाल विरदु सम्भारी, हरहु नाथ मम संकट भारी | जीवन में भला ईश्वर का साथ किसे नहीं चाहिए होता है, ऐसे में भगवान की कृपा और उनका साथ पाने के लिए इस पंक्ति का जप सर्वश्रेष्ठ माना गया है, कामिहि नारी पियारी जिमी, लोभी प्रिय जिमि दाम | तेहि रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहु मोहि राम ||

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रामचरितमानस की चौपाइयां करेंगी आपकी हर मनोकामना पूरी
posted Jul 26, 2020 by Deepika Maheshwary

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जन्मपत्रिका के 12 भावों में छुपे हैं कई राज, हर भाव की है खास बात। अज्ञानता से भय, भय से भ्रांति, भ्रांति से भूल, भूल से गलत परिणाम और गलत परिणाम से असफलता और असफलता से दु:ख अर्थात अगर देखा जाए तो दु:ख का सबसे बड़ा कारण जो है, वो है अज्ञानता और इसको दूर करने तथा सही ज्ञान का मार्ग दिखने का काम एक ज्योतिष करता है। सही ज्ञान देने के लिए कई मार्ग हैं, जैसे- न्यूमरोलोजी (अंक-विज्ञान), सामुद्रिक शास्त्र (हस्त-रेखा) टैरो कार्ड, वास्तु और कुंडली। कुंडली यानी जन्मपत्रिका से भविष्यवाणी करना सबसे पुरातन और सटीक विज्ञान माना जाता है। जातक की कुंडली उसकी जन्मतिथि, समय, स्थान के आधार पर बनाई जाती है। यद्यपि कई कारणों से जन्म समय में संशोधन की आवश्यकता हो जाती है। इसीलिए हर ज्ञानी ज्योतिष को यह मालूम होता है कि संशोधन कैसे किया जाता है। भविष्यवाणी करने से पहले एक योग्य ज्योतिषी को जांच कर लेना चाहिए कि जातक की कुंडली सही है की नहीं। जांच करने से पहले जातक के जीवन और गोचर की मुख्य घटनाओं का मिलान कर लेना चाहिए। यदि मिलान सही हो तो कुंडली सही है और नहीं तो कुंडली में जन्म समय संशोधन की आवश्यकता है। ज्योतिष में मान्य बारह राशियों के आधार पर जन्मकुंडली में बारह भावों की रचना की गई है। प्रत्येक भाव में मनुष्य जीवन की विविध अव्यवस्थाओं, विविध घटनाओं को दर्शाता है। 1. प्रथम भाव : यह लग्न भी कहलाता है। इस स्थान से व्यक्ति की शरीर यष्टि, वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज, सुख-दुख, आत्मविश्वास, अहंकार, मानसिकता आदि को जाना जाता है। 2. द्वितीय भाव : इसे धन भाव भी कहते हैं। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, परिवार का सुख, घर की स्थिति, दाईं आंख, वाणी, जीभ, खाना-पीना, प्रारंभिक शिक्षा, संपत्ति आदि के बारे में जाना जाता है। 3. तृतीय भाव : इसे पराक्रम का सहज भाव भी कहते हैं। इससे जातक के बल, छोटे भाई-बहन, नौकर-चाकर, पराक्रम, धैर्य, कंठ-फेफड़े, श्रवण स्थान, कंधे-हाथ आदि का विचार किया जाता है। 4. चतुर्थ स्थान : इसे मातृ स्थान भी कहते हैं। इससे मातृसुख, गृह सौख्‍य, वाहन सौख्‍य, बाग-बगीचा, जमीन-जायदाद, मित्र, छाती-पेट के रोग, मानसिक स्थिति आदि का विचार किया जाता है। 5. पंचम भाव : इसे सुत भाव भी कहते हैं। इससे संतति, बच्चों से मिलने वाला सुख, विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में यश, नौकरी परिवर्तन आदि का विचार किया जाता है। 6. छठा भाव : इसे शत्रु या रोग स्थान भी कहते हैं। इससे जातक के श‍त्रु, रोग, भय, तनाव, कलह, मुकदमे, मामा-मौसी का सुख, नौकर-चाकर, जननांगों के रोग आदि का विचार किया जाता है। 7. सातवां भाव : विवाह सौख्य, शैय्या सुख, जीवनसाथी का स्वभाव, व्यापार, पार्टनरशिप, दूर के प्रवास योग, कोर्ट कचहरी प्रकरण में यश-अपयश आदि का ज्ञान इस भाव से होता है। इसे विवाह स्थान कहते हैं। 8. आठवां भाव : इस भाव को मृत्यु स्थान कहते हैं। इससे आयु निर्धारण, दु:ख, आर्थिक स्थिति, मानसिक क्लेश, जननांगों के विकार, अचानक आने वाले संकटों का पता चलता है। 9. नवां भाव : इसे भाग्य स्थान कहते हैं। यह भाव आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय, बुद्धिमत्ता, गुरु, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी, दूसरा विवाह आदि के बारे में बताता है। 10. दसवां भाव : इसे कर्म स्थान कहते हैं। इससे पद-प्रतिष्ठा, बॉस, सामाजिक सम्मान, कार्य क्षमता, पितृ सुख, नौकरी व्यवसाय, शासन से लाभ, घुटनों का दर्द, सासु मां आदि के बारे में पता चलता है। 11. ग्यारहवां भाव : इसे लाभ भाव कहते हैं। इससे मित्र, बहू-जंवाई, भेंट-उपहार, लाभ, आय के तरीके, पिंडली के बारे में जाना जाता है। 12. बारहवां भाव : इसे व्यय स्थान भी कहते हैं। इससे कर्ज, नुकसान, परदेश गमन, संन्यास, अनैतिक आचरण, व्यसन, गुप्त शत्रु, शैय्या सुख, आत्महत्या, जेल यात्रा, मुकदमेबाजी का विचार किया जाता है। किसी घटना के फलित होने या घटित होने के लिए हमें घटना के फलित होने का एक ही संगत घर नहीं देखना चाहिए अपितु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभाव डालने वाले सभी घरों का अध्ययन भी करना चाहिए। किसी घटना की भविष्यवाणी करते समय अन्य घरों के प्रभाव भी विचारणीय हैं।
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शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में भक्त मां को प्रसन्न करने की कोशिश करते है. नवरात्रि में देवी पूजन और नौ दिन के व्रत का बहुत महत्व है. इन नौ दिनों में भक्तों नियमों के साथ मां की पूजा करते हैं. इसबार अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ेगी, जिसके कारण नवरात्र में देवी आराधना के लिए पूरे 9 दिन मिलेंगे. प्रतिपदा तिथि को माता के प्रथम स्वरूप शैल पुत्री के साथ ही कलश स्थापना के लिए भी अति महत्त्वपूर्ण दिन होता है. कलश स्थापना या कोई भी शुभ कार्य शुभ समय एवं तिथि में किया जाना शुभ माना जाता है, इसलिए इस दिन कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त पर विचार किया जाना अत्यावश्यक है. नवरात्र के 9 दिनों में मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और हर स्वरूप सौभाग्य का प्रतीक होता है. इन शुभ दिनों में मां की हर रोज पूजा की जाती है और ज्यादातर लोग 9 दिन का व्रत भी रखते हैं. वैसे तो मां को श्रद्धा भाव से लगाए गए हर भोग को ग्रहण करती हैं लेकिन नवरात्र के दिनों में मां के हर स्वरूप का अलग भोग लगता है. कलश स्था‍पना की तिथि और शुभ मुहूर्त कलश स्था‍पना की तिथि: 17 अक्टूबर 2020 कलश स्था‍पना का शुभ मुहूर्त: 17 अक्टूबर 2020 को सुबह 06 बजकर 23 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक। कुल अवधि: 03 घंटे 49 मिनट अभिजीत मुहूर्त सभी शुभ कार्यों के लिए अति उत्तम होता है। जो मध्यान्ह 11:43 से 12:29 तक होगा। शुभ का चौघड़िया सुबह 07:49 से 09:14 तक होगा जिसने कलश स्थापना की जा सकती है स्थिर लग्न कुम्भ दोपहर 2:30 से 3:55 तक होगा, साथ ही शुभ चौघड़िया भी इस समय प्राप्त होगी, अतः यह अवधि कलश स्थापना हेतु अतिउत्तम है। जानिए कैसे करें नवरात्रि पर कलश पूजन सभी प्राचीन ग्रंथों में पूजन के समय कलश स्थापना का विशेष महत्व बताया गया है. सभी मांगलिक कार्यों में कलश अनिवार्य पात्र है. दुर्गा पूजन में कलश की स्थापना करने के लिए कलश पर रोली से स्वास्तिक और त्रिशूल अंकित करना चाहिए और फिर कलश के गले पर मौली लपेट दें. जिस स्थान पर कलश स्थापित किया जाता है पहले उस स्थान पर रोली और कुमकुम से अष्टदल कमल बनाकर पृथ्वी का स्पर्श करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- ओम भूरसि रस्यादितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धात्रीं। पृथिवीं यच्छ पृथिवी दृह पृथ्वीं माहिसीः।। ओम आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्तिवन्दवः। पुनरूर्जानि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः।।
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हिन्दी पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी ति​थि को अनंत चतुर्दशी मनाई जाती है। इसे अनंत चौदस भी कहा जाता है। इस वर्ष अनंत चतुर्दशी 01 सिंतबर दिन मंगलवार को है। अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है। अनंत चतुर्दशी के दिन ही भगवान विघ्नहर्ता श्री गणेश जी की मूर्तियों का विसर्जन भी किया जाता है। अनंत चतुर्दशी के साथ ही भगवान गणपति को सहर्ष विदा किया जाता है और अगले वर्ष आने की प्रार्थना की जाती है। इसके साथ ही 10 दिनों के गणेशोत्सव का समापन हो जाता है। आइए जानते हैं कि इस अनंत चतुर्दशी पर पूजा का मुहूर्त एवं महत्व क्या है। अनंत चतुर्दशी मुहूर्त अनंत चतुर्दशी की उदया ​तिथि ली जाती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी ति​​थि का प्रारंभ 31 ​अगस्त दिन सोमवार को सुबह 08 बजकर 49 मिनट से हो रहा है, जो 01 सितंबर को सुबह 09 बजकर 39 मिनट तक है। ऐसे में 01 सितंबर को उदया तिथि मिल रही है, इसलिए अनंत चतुर्दशी 01 सितंबर को मनाई जाएगी। अनंत चतुर्दशी पूजा अनंत चतुर्दशी के दिन मुख्यत: भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन लोग व्रत रखते हैं। इस दिन व्रत रखने वाले पुरुष अपने दाहिने हाथ में और महिलाएं अपने बाएं हाथ में अनंत धागा धारण करती हैं। यह धागा 14 गांठों वाला होता है। ये 14 गांठें भगवान श्री विष्णु के द्वारा निर्मित 14 लोकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अनंत चतुर्दशी व्रत का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि अनंत चतुर्दशी का व्रत लगातार 14 वर्षों तक किया जाए तो उस व्यक्ति को विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। अनंत चतुर्दशी: गणपति विसर्जन का दिन 22 अगस्त 2020 को गणेश चतुर्थी के दिन जिन लोगों ने 10 दिनों के लिए गणपति बप्पा की स्थापना की थी, वे लोग 01 सितंबर को गणेश मूर्ति का बहते जल में विसर्जन करेंगे।
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चन्द्र और मनोविज्ञान ********************* चन्द्रमा और मनोविज्ञान का आपस में बड़ा गहरा सम्बन्ध है ! खगोलशास्त्र और विज्ञान के अनुसार जब जब समुद्र में ज्वारभाटा आता है या सुनामी आती है तब तब उसके पीछे चन्द्र जिसे की मून भी कहते हैं वही कारण बनता है , तो साइंस के मुताबिक भी हमारी धरती पर सूर्य के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव चन्द्र का ही माना जाता है , इसे हम सीधे तौर पर इस तरह से भी समझ सकते हैं की सूर्य जो की सौरमंडल में उर्जा का स्रोत है या कारक है उससे हमें प्रकाश मिलता है , एनेर्जी मिलती है जो के इस धरती पर रहने वाले चर अचर के लिए बहुत ही ज़रूरी है और साथ ही मून यानी चन्द्र जो के शीतलता का कारक है सूर्य से उर्जा लेकर इस धरती के चर अचर पर शीतल उर्जा की छिडकाव करता है जो की हमारे अन्तर्मन यानी मन के की खुराक की लिए ज़रूरी बनता है ! अब बात जब चन्द्र की हो रही है तो हम इसे कारक मन का ही मानेंगे और साथ ही देखेंगे की क्यों चन्द्र मन का स्वामी माना जाता है ! चन्द्र को लूनर भी कहा जाता है और जो व्यक्ति अर्धविक्षप्त हो जाता है उसे भी लुनैटिक कहा जाता है तो इसका अभिप्राय यही निकलता है की हर मानव के मन को चन्द्रमा बहुत प्रभावित करता है और पागलपन के पीछे भी चन्द्र ही कारण रहता है ! चन्द्र को काल पुरुष का मन भी कहा जाता है और जिसकी कलाएं पहले पंद्रह दिन घटती है और बाकी पंद्रह दिन बढती हैं , जिन्हें हम क्रिशन पक्ष और शुक्ल पक्ष भी कहते हैं, चन्द्र सताईस नक्षत्रों का अधिपति भी माना जाता है और रोहणी नक्षत्र में उच्च का मान जाता है क्यों की उस नक्षत्र में चन्द्र की कलाएं पूरनता की तरफ बढती हैं ! आम तौर पर ये देखने में आता है की जब जब पूरणमाशी का वक़्त आता है तो उस वक़्त समुद्र में ज्वारभाटा आता है क्यों की पानी जिसे जल भी कहते हैं उसका कारक भी चंद्रमा माना जाता है और जिस दिन पूरण चन्द्र होता है उस दिन जल अपने कारक की तरफ आकर्षित होता है और उस वक़्त जिन व्यक्तियों का चन्द्र कमजोर होता है उन्हें दिमागी परेशानी होनी शुरू हो जाती है यानी उनकी बेचैनी बढ़ जाती है , इसी प्रकार से अमावस्या के दिन भी होता है जब चन्द्र क्षीण माना जाता है तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है की चन्द्र का मन के साथ बड़ा गहरा नाता है और अगर हम किसी होरोस्कोप में चन्द्र की पोजीशन देखें तो हमें साफ़ साफ़ पता चल जाता है की हमारा मन कितना चंचल होगा या मजबूत होगा जब किसी का चन्द्र राहू , केतु के साथ होगा तो वह उसे भ्रमित रखेगा और शनि के साथ तनाव ग्रसित और अंदर से दुखी और दुनियादारी से दूर रखेगा और वही चन्द्र जब शुक्र के साथ होगा तो भौतिक सुखों की तरफ लालायित रखेगा और वृहस्पति के साथ गज केसरी योग बनाता हुआ उसे आंतरिक सुख प्रदान करता है मतलब की चन्द्र के साथ सच्ची ख़ुशी वृहस्पति के मेल से ही पौसिबल हो पाती है परन्तु इतना ही काफी नहीं चन्द्र की कलाएं और उसका अच्छे घरों में बैठना भी देखा जाता है यानी की शुक्ल पक्ष का बढ़ता हुआ चन्द्र अच्छा माना जाता है , चन्द्र का पक्ष बल इसे ही कहा जाता है तो चन्द्र के कमजोर होने पर कुंडली भी कमजोर हो जाती है मतलब की प्रकाश पुंज सूर्य और चन्द्र दोनों की किसी भी कुंडली में बलबान स्तिथि उस जातक को बलबान , शक्तिशाली और सफल बना देती है , और अंत में ये ही कहा जाएगा की हमें अपने अपने कर्मों का फल जैसे जैसे मिलता है वैसे वैसे ही कुंडली में गृह रिफ्लेक्ट करते हैं इसमें किसी और का कोई दोष नहीं दोष हमारा खुद का ही होता है क्यों की हम दुनिया दारी के भ्रम और मायाजाल में हरदम रहते हैं तो वेवजह एक दुसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं , हमारा भ्रम सिर्फ इतना ही होता है की हम बादलों से आसमा के ढकने पर ये मान लेते हैं की सूर्य है ही नहीं जब की सूर्य अमर है बादलों के पीछे है तो गृह और हमारे करम भी कुछ इसी तरह से हमें भ्रमित करते रहते हैं या ये कहना ठीक होगा की हम भ्रमित रहते हैं,तो वेवजह का भ्रम पालना हमें मानसिक तौर पर बीमार कर देता है अब ये सब कुछ हमारे हाथ में है या नहीं इस बहस में क्या पड़ना , जो है सामने है और जो सामने है उसे ठीक करने का हमारा प्रयास होना चाहिए और वो चाहे कैसे भी हो मतलब अच्छे करम , अच्छे विचार सद्व्यवहार इश्वर पर भरोसा तो सब गृह चाहे पूरी तरह से शांत न भी हों तब भी हम कुछ हद तक अच्छा जीवन जरूर गुज़ार सकते हैं पर कंडीशन वही है की कोशिश मन , वचन और क्रम से होनी चाहिए न की बनावटीपन से क्यों की उससे सिर्फ हम अपने आप को ही धोखा देते रहते हैं , तो अगर हम चाहते हैं की हमारे गृह सुधरें तो हमें उपायों से ज्यादा अच्छे कर्मों की तरफ जयादा ध्यान देना चाहिए और अच्छे करम भी दिल से करने चाहिए और निष्काम क्यों की “ हम जिस दुनिया में रहते हैं वहां हमें मुखौटे लगाने पढ़ते हैं जिससे की दुनिया हमें न पहचान पाए पर ईश्वर के आगे कोई मुखौटा नहीं चलता “ जब जब हमारी कोशिश ईश्वर के आगे मुखौटा लगाने की होती है तब तब हम अपने ही मकडजाल या भ्रमजाल में उलझते जाते हैं तो ग्रहों के उपाए भी मात्र यही सन्देश देते हैं की अच्छे करम , शुभ करम और निष्काम करम करते जाओ और फिर देखो की उस परमात्मा की कैसी कृपा होती है !
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भगवान शिव को महाकाल कहा गया है और वही देवों के देव महादेव हैं। उन्होंने गंगा को अपने शीष पर धारण किया है। कहते हैं कि अगर भोलेभंडारी भोलेनाथ की पूरे श्रद्धा भाव से पूजा की जाए तो वो हमारी जिंदगी की सभी समस्याओं को समाप्त करते हैं। महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त भगवान के भक्तों के लिए महाशिवरात्रि का पर्व बेहद खास होता है। हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है महाशिवरात्रि। इस दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। फाल्गुन के महीने की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है। महाशिवरात्रि के दिन लोग व्रत रखते हैं और पूरे विधि विधान से भगवान शिव की अराधना करते हैं। महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त 21 फरवरी 2020 (शुक्रवार) की शाम 05 बजकर 20 मिनट से 22 फरवरी 2020 (शनिवार) शाम 07 बजकर 2 मिनट तक। महाशिवरात्रि का महत्व हिंदू पंचांग के मुताबिक, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। कहते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव पर जल चढ़ाने से वह प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। महाशिवरात्रि पर भक्त पूरे दिन और रात व्रत रखते हैं। अगले दिन सुबह वह व्रत का पारण करते हैं। महाशिवरात्रि पर सूर्य उत्तरायण रहता है और चंद्रमा कमजोर स्थिति में। चंद्रमा मन का कारक है इसलिए चंद्रमा को मजबूत करने के लिए महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ का अभिषेक करना चाहिए। शिवरात्रि की पूजा विधि इस दिन सबसे पहले भगवान शंकर को पंचामृत से स्नान कराएं इसके बाद शिवलिंग पर शहद, पानी और दूध के मिश्रण से भोले शंकर को स्नान कराएं। फिर बेलपत्र, धतूरा, फल और फूल भगवान शिव को अर्पित करें। धूप और दीप जलाकर भगवान शिव की आरती करें। इस दिन भोले शिव को बेर चढ़ाना भी बहुत शुभ होता है। शिव महापुराण में कहा गया है कि इन छह द्रव्यों, दूध, दही, शहद, घी, गुड़ और पानी से भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। जल से रुद्राभिषेक करने से शुद्धि गुड़ से रुद्राभिषेक करने से खुशियां घी से रुद्राभिषेक करने से जीत शहद से रुद्राभिषेक करने से मीठी वाणी दही से रुद्राभिषेक करने से समृद्धि
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