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चन्दनं शीतलं लोके चंदनादपि चंद्रमा: | चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगत: || sandalwood is pleasant (cool), moon (or moon light) is more pleasant than sandal. (but) company of a good person (sAdhu) is pleasant then both moon and sandal. *संसार में चन्दन को शीतल माना जाता है लेकिन चन्द्रमा चन्दन से भी शीतल होता है | अच्छे मित्रों का साथ चन्द्र और चन्दन दोनों की तुलना में अधिक शीतलता देने वाला होता है |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
posted Aug 4 by Ajay Shastri

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नमन्ति फलिता वृक्षा नमन्ति च बुधा जनाः। शुष्ककाष्ठानि मूर्खाश्च भिद्यन्ते न नमन्ति च॥ Trees with fruits bend, wise people become humble but dry wood and fool do not bend even when they are cut. *फले हुए वृक्ष झुक जाते हैं और बुद्धिमान लोग विनम्र हो जाते हैं पर सूखी लकड़ी और मूर्ख काटने पर भी नहीं झुकते॥* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्रो रक्षति वार्धक्ये न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ In childhood, a woman is protected by her father, by her husband in her youth and by her sons in her old age. A woman should never be left alone to fend for herself. *इस श्लोक के अनुसार बालपन में यानी बचपन में स्त्री की रक्षा की जिम्मेदारी उसके पिता की होती है। जब स्त्री का विवाह हो जाता है तो उसकी रक्षा की पूरी जिम्मेदारी उसके पति की होती है। बुढ़ापे में स्त्री की संतानों को ही उसकी रक्षा करनी चाहिए। जिन घरों में इस बात का ध्यान रखा जाता है, वहां नारी पूरी तरह सुरक्षित रहती है और घर का मान-सम्मान बना रहता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रतयं हितम् | कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धय: || Mother, father and friend are the one who think about our interests (well-being) in a very much natural manner. [It's part of their nature ('swaBAv').They think this without expecting any thing in return.] All others having the similar feelings towards us do so due to their personal benefits or any other reason [It is not part of their nature ('swaBAv')]. *माता,पिता और मित्र ये तीनो कहने के लिए तो तीन होते है पर ये एक ही होते है क्योंकि ये तीनो ही अपने स्वभाव से हमेशा हित ही करते है।* *जब कोई विशेष कार्य या विशेष परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है तब ये तीनो ही हमें सही दिशा या सही बुद्धि देते है जो हमारे हित में होता है।।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सियाराम।
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उद्यमेनैव हि सिध्यन्ति, कार्याणि न मनोरथै। न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मृगाः॥ Things are achieved by doing and not by desiring alone as deers by themselves don't go into a lion's mouth. *प्रयत्न करने से ही कार्य पूर्ण होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं, सोते हुए शेर के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते हैं।* *Hari Om,pranam,jai sitaram*
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न निर्मितः केन न दृष्टपूर्वः न श्रूयते हेममयः कुरङ्गः । तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ॥ Neither has one made golden deer nor has anyone seen a golden deer. Even though, Ram desired to get the golden deer. In the time of destruction the intelligence goes opposite. *स्वर्ण मृग न तो ब्रह्मा ने रचा था और न किसी ओर ने उसे बनाया था, न पहले कभी देखा गया था, न कभी सुना गया था, तब भी श्रीराम की उसे पाने (मारीच का मायावी रूप कंचन मृग ) की इच्छा हुई, अर्थात सीता के कहने पर वे उसे पाने के लिए दौड़ पड़े । किसी ने ठीक ही कहा है-"विनाश काले विपरीत बुद्धि।' जब विनाश काल आता है, तब बुद्धि नष्ट हो जाती है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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