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कृष्णजन्माष्टमी विशेष 2020-ऐसे मनाएं भगवान कृष्‍ण का जन्‍मोत्‍सव, जन्माष्टमी व्रत और पूजा विधि

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हर साल भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र मैं कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है इस साल यह त्योहार 11-12 अगस्त यानी दो दिन मनाया जाएगा। हिन्दू पंचांग अनुसार इस वर्ष स्मार्त संप्रदाय के लोग श्री कृष्ण जन्माष्टमी 11 अगस्त को मनाएंगे, तो वहीं वैष्णव पंथ के अनुयायी 12 अगस्त को मनाएंगे।ज्योतिषाचार्यों की मानें तो 12 अगस्त बुधवार को जन्माष्टमी मनाना ज्यादा उत्तम है. 11 अगस्त को अष्टमी तिथि सूर्योदय के बाद लगेगी, श्री कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को "रोहिणी नक्षत्र" में हुआ था. इस साल जन्माष्टमी पर्व पर तिथि और नक्षत्र का संयोग एक ही दिन नहीं बन रहा है सर्वार्थ सिद्धि योग बुधवार के दिन है. उच्च राशि (वृषभ) के चंद्रमा हैं, ब्रह्म मुहूर्त में जो तिथि होती है, वैष्णव उसी दिन उत्सव मनाते हैं. 12 अगस्त को ब्रह्म मुहूर्त में अष्टमी तिथि होने के कारण वैष्णव श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 12 अगस्त को मनाएंगे. इस वजह से 12 अगस्त की रात में जन्माष्टमी मनाना अधिक शुभ रहेगा. 12 अगस्त को बुधवार और रोहिणी नक्षत्र भी पड़ रहा है. इसी दिन अधिकतर स्थानों पर उत्सव मनाया जाएगा. श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का महत्व शास्त्रों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के व्रत को ‘व्रतराज’ कहा जाता है, इसीलिए इस दिन व्रत एवं पूजन का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से साल में होने वाले कई अन्य व्रतों का फल मिल जाता है। भगवान विष्णु के आठवें अवतार कहे जाने वाले कृष्ण के दर्शन मात्र से ही मनुष्य के सभी दुःख दूर हो जाते हैं। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से इस व्रत का पालन करते है, उसे महापुण्य की प्राप्ति होती है। जन्माष्टमी का व्रत संतान प्राप्ति, सुख-समृद्धि, वंश वृद्धि, दीर्घायु और पितृ दोष आदि से मुक्ति के लिए भी एक वरदान समान है। जिन जातकों का चंद्रमा कमजोर हो, वे भी जन्माष्टमी पर विशेष पूजा कर के लाभ पा सकते हैं। जन्माष्टमी व्रत और पूजा विधि जन्माष्टमी व्रत में अलग-अलग जगहों पर लोग अपनी सच्ची श्रद्धा से अलग-अलग तरीके से पूजा-व्रत करते हैं। कुछ लोग जन्माष्टमी के एक दिन पहले से व्रत रखते हैं, तो वहीँ अधिकांश लोग जन्माष्टमी का व्रत अष्टमी तिथि के दिन उपवास और नवमी तिथि के दिन पारण करते हैं जन्माष्टमी व्रत को करने वाले को व्रत से एक दिन पहले यानि सप्तमी को सात्विक भोजन करना चाहिए। अष्टमी को यानि उपवास वाले दिन प्रातःकाल उठकर स्नानादि करें। फिर सभी देवी-देवताओं को नमस्कार करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। अब हाथ में जल और पुष्प आदि लेकर व्रत का संकल्प लें और पूरे विधि-विधान से बाल गोपाल की पूजा करें। दोपहर के समय जल में काले तिल मिलाकर दोबारा स्नान करें। अब देवकी जी के लिए एक प्रसूति गृह बनाएँ। इस सूतिका गृह में एक सुन्दर बिछौना बिछाकर उसपर कलश स्थापित कर दें। अब देवकी, वासुदेव, बलदेव, नन्द, यशोदा और लक्ष्मी जी का नाम लेते विधिवत पूजा करें। रात में 12 बजने से थोड़ी देर पहले वापस स्नान करें। अब एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछा लीजिए और उसपर भगवान् कृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। कृष्ण को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराने के बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाकर उनका श्रृंगार करें। बाल गोपाल को धुप, दीप दिखाए, उन्हें रोली और अक्षत का तिलक लगाकर, माखन-मिश्री का भोग लगाएँ। गंगाजल और तुलसी के पत्ते का पूजा में अवश्य उपयोग करें। विधिपूर्वक पूजा करने के बाद बाल गोपाल का आशीर्वाद लें। जन्मष्टमी के दिन व्रत रखने वाले लोगों को रात बारह बजे की पूजा के बाद ही व्रत खोलना चाहिए। (इस व्रत में अनाज ग्रहण नहीं किया जाता है। आप फलहार कर सकते हैं या फिर कुट्टू या सिंघाड़े के आटे का हलवा बना सकते हैं।)धनिया और चरणामृत का प्रसाद लेने और फल ग्रहण करें जन्माष्टमी पर व्रत मे जरूर करें नियमों का पालन---- इस खास दिन भूलकर भी किसी प्रकार के पेड़-पौधों को हानि न पंहुचाए। यथासंभव ज़रूरतमंद लोगों की सहायता करें। इस दिन राधा-कृष्ण मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन ज़रूर करें। यदि संभव हो तो अपने घर में या फिर मंदिर में कीर्तन का आयोजन करें। भगवान कृष्ण को मोरपंख बहुत पसंद था, इसलिए जन्माष्टमी की पूजा करते वक़्त पूजास्थल पर कृष्ण की मूर्ति या चित्र के पास मोरपंख ज़रूर रखें। कृष्ण जी की मूर्ति के पास एक लकड़ी की बाँसुरी भी ज़रुर रखनी चाहिए।

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कृष्णजन्माष्टमी विशेष 2020-ऐसे मनाएं भगवान कृष्‍ण का जन्‍मोत्‍सव, जन्माष्टमी व्रत और पूजा विधि
posted Aug 11, 2020 by Deepika Maheshwary

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शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में भक्त मां को प्रसन्न करने की कोशिश करते है. नवरात्रि में देवी पूजन और नौ दिन के व्रत का बहुत महत्व है. इन नौ दिनों में भक्तों नियमों के साथ मां की पूजा करते हैं. इसबार अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ेगी, जिसके कारण नवरात्र में देवी आराधना के लिए पूरे 9 दिन मिलेंगे. प्रतिपदा तिथि को माता के प्रथम स्वरूप शैल पुत्री के साथ ही कलश स्थापना के लिए भी अति महत्त्वपूर्ण दिन होता है. कलश स्थापना या कोई भी शुभ कार्य शुभ समय एवं तिथि में किया जाना शुभ माना जाता है, इसलिए इस दिन कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त पर विचार किया जाना अत्यावश्यक है. नवरात्र के 9 दिनों में मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और हर स्वरूप सौभाग्य का प्रतीक होता है. इन शुभ दिनों में मां की हर रोज पूजा की जाती है और ज्यादातर लोग 9 दिन का व्रत भी रखते हैं. वैसे तो मां को श्रद्धा भाव से लगाए गए हर भोग को ग्रहण करती हैं लेकिन नवरात्र के दिनों में मां के हर स्वरूप का अलग भोग लगता है. कलश स्था‍पना की तिथि और शुभ मुहूर्त कलश स्था‍पना की तिथि: 17 अक्टूबर 2020 कलश स्था‍पना का शुभ मुहूर्त: 17 अक्टूबर 2020 को सुबह 06 बजकर 23 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक। कुल अवधि: 03 घंटे 49 मिनट अभिजीत मुहूर्त सभी शुभ कार्यों के लिए अति उत्तम होता है। जो मध्यान्ह 11:43 से 12:29 तक होगा। शुभ का चौघड़िया सुबह 07:49 से 09:14 तक होगा जिसने कलश स्थापना की जा सकती है स्थिर लग्न कुम्भ दोपहर 2:30 से 3:55 तक होगा, साथ ही शुभ चौघड़िया भी इस समय प्राप्त होगी, अतः यह अवधि कलश स्थापना हेतु अतिउत्तम है। जानिए कैसे करें नवरात्रि पर कलश पूजन सभी प्राचीन ग्रंथों में पूजन के समय कलश स्थापना का विशेष महत्व बताया गया है. सभी मांगलिक कार्यों में कलश अनिवार्य पात्र है. दुर्गा पूजन में कलश की स्थापना करने के लिए कलश पर रोली से स्वास्तिक और त्रिशूल अंकित करना चाहिए और फिर कलश के गले पर मौली लपेट दें. जिस स्थान पर कलश स्थापित किया जाता है पहले उस स्थान पर रोली और कुमकुम से अष्टदल कमल बनाकर पृथ्वी का स्पर्श करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- ओम भूरसि रस्यादितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धात्रीं। पृथिवीं यच्छ पृथिवी दृह पृथ्वीं माहिसीः।। ओम आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्तिवन्दवः। पुनरूर्जानि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः।।
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एकादशी की पूजा भगवान विष्णु के लिए की जाती है। इस दिन व्रत और विधिवत पूजा करके नारायण को प्रसन्न किया जाता है। साथ ही इस दिन अपने इष्टदेव की पूजार्चना की जाती है। अभी आषाढ़ मास चल रहा है। इस माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी 17 जून इसे योगिनी एकादशी कहा जाता है। एकादशी पर भगवान विष्णु के लिए व्रत-उपवास करना चाहिए। एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ ही देवी लक्ष्मी का अभिषेक करें। पूजा में दक्षिणावर्ती शंख में केसर मिश्रित दूध भरें और अभिषेक करें। बाल गोपाल का भी इसी तरह अभिषेक करें। श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को माखन-मिश्री का भोग लगाएं। शिवलिंग पर तांबे के लोटे से जल चढ़ाएं और ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। मंत्र जाप की संख्या कम से कम 108 होनी चाहिए। भगवान को बिल्व पत्र और धतूरा भी चढ़ाएं। दीपक और कर्पूर जलाकर आरती करें। हनुमानजी के सामने दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। पूजा के बाद जरूरतमंद लोगों को धन और अनाज का दान करें। इस तिथि पर सुबह तुलसी को जल जरूर चढ़ाएं और सूर्यास्त के तुलसी के पास दीपक जलाएं और परिक्रमा करें।
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हिंदू धर्म में शक्ति की देवी मां दुर्गा की उपासना का पर्व चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल दिन मंगलवार से प्रारंभ हो रहा हैं। हिंदू पंचांग में चैत्र मास को हिंदू नववर्ष का प्रथम मास माना जाता है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की जाती है और मां दुर्गा के भक्त इस दिन पूरी आस्था के साथ घटस्थापना और जवारे बो कर नौ दिनों तक श्रद्धापूर्वक माता की पूजा करते हैं। नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां भगवती के एक स्वरुप (श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री) की पूजा की जाती है । यह क्रम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रात: काल शुरू होता है । सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है । आइए जानते हैं कैसे करते हैं घट स्थापना- घटस्थापना शुभ मुहूर्त: घटस्थापना मुहूर्त – सुबह 05:58 से 10:14 Am तक घटस्थापना का अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11:56 Am से 12:47 Pm घटस्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – अप्रैल 12, 2021 को 08:00 Am प्रतिपदा तिथि समाप्त – अप्रैल 13, 2021 को 10:16 Am घट स्थापना करना अर्थात नवरात्रि की कालावधि में ब्रह्मांड में कार्यरत शक्ति तत्त्व का घट में आवाहन कर उसे कार्यरत करें। कार्यरत शक्ति तत्त्व के कारण वास्तु में विद्यमान कष्टदायक तरंगें नष्ट हो जाती हैं । सामग्री: जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र जौ बोने के लिए शुद्ध साफ की हुई मिटटी पात्र में बोने के लिए जौ घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश कलश में भरने के लिए शुद्ध जल, गंगाजल मोली (Sacred Thread) इत्र साबुत सुपारी दूर्वा कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के पंचरत्न अशोक या आम के 5 पत्ते कलश ढकने के लिए ढक्कन ढक्कन में रखने के लिए बिना टूटे चावल पानी वाला नारियल नारियल पर लपेटने के लिए लाल कपड़ा फूल माला विधि सबसे पहले जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र लें । इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाएं । अब एक परत जौ की बिछाएं । इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं । अब फिर एक परत जौ की बिछाएं । जौ के बीज चारों तरफ बिछाएं ताकि जौ कलश के नीचे न दबे । इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं । अब कलश के कंठ पर मोली बांध दें । कलश में शुद्ध जल, गंगाजल कंठ तक भर दें । कलश में साबुत सुपारी, दूर्वा, फूल डालें । कलश में थोड़ा सा इत्र डाल दें । कलश में पंचरत्न डालें । कलश में कुछ सिक्के रख दें । कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें । अब कलश का मुख ढक्कन से बंद कर दें । ढक्कन में चावल भर दें । इसके बाद नारियल पर लाल कपड़ा लपेट कर मोली लपेट दें । अब नारियल को कलश पर रखें । शास्त्रों में उल्लेख मिलता है: “अधोमुखं शत्रु विवर्धनाय,ऊर्ध्वस्य वस्त्रं बहुरोग वृध्यै। प्राचीमुखं वित विनाशनाय,तस्तमात् शुभं संमुख्यं नारीकेलं”। अर्थात् नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में वृद्धि होती है । नारियल का मुख ऊपर की तरफ रखने से रोग बढ़ते हैं, जबकि पूर्व की तरफ नारियल का मुख रखने से धन का विनाश होता है । इसलिए नारियल की स्थापना सदैव इस प्रकार करनी चाहिए कि उसका मुख साधक की तरफ रहें । ध्यान रहे कि नारियल का मुख उस सिरे पर होता है, जिस तरफ से वह पेड़ की टहनी से जुड़ा होता है । अब कलश को उठाकर जौ के पात्र में बीचों बीच रख दें । अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें । "हे सभी देवी देवता और माँ दुर्गा आप सभी नौ दिनों के लिए इस में पधारें ।" अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें । धूपबत्ती कलश को दिखाएं । कलश को माला अर्पित करें । कलश को फल मिठाई अर्पित करके कलश को इत्र समर्पित करें । कलश स्थापना के साथ ही भक्त मां की पूजा-अर्चना प्रारंभ कर देता है । घटस्थापना का महत्व नवरात्रि में घटस्थापना का विशेष महत्व होता है। ये नवरात्रि का पहला दिन होता है और इस दिन से नवरात्रि का आरंभ होता है सनातन धर्म में किसी शुभ कार्य को करने से पहले कलश स्थापना करना शुभ माना जाता है और इसी कलश को शास्त्रों में भगवान गणेश की संज्ञा दी गई है। इस लिए हर पूजा या मंगल कार्य की शुरुआत सर्वप्रथम गणेश जी की वंदना से की जाती है, जिसमें कलश की स्थापना पूरे विधि-विधान करने के बाद ही कोई शुभ कार्य किया जाता है। चैत्र नवरात्रि शक्ति देवी मां दुर्गा का पर्व है। नौ दिनों तक अलग-अलग माताओं की पूजन विभिन्न तरीको से जैसे – अखंड दीप साधना, व्रत उपवास, दुर्गा सप्तशती व नवार्ण मंत्र का जाप करें। अष्टमी को हवन व नवमी को नौ कन्याओं का पूजन करें।
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6 जुलाई से सावन का महिना शुरू गया है भोलेनाथ को ये महिना अति प्रिय है इस दिन देवो के देव महादेव यानी भगवान् शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना की जाती है और इनकी पूजा अत्यन्य फलदायी होती है इस वार सावन के महीने में 5 सोमवार होंगे यानि सावन 6 जुलाई से शुरू होकर 3 अगस्त को ख़त्म होगा ! ऐसा माना जाता है कि सावन के महीने में भगवान् शिव की पूजा करने से जीवन के कष्टों से निवारण मिलता है ! सच्चे मन से भगवान् शिव की आराधना करने से मन वांछित फल मिलता है ! सावन का व्रत शुरू करने की विधि सोमवार का व्रत सूर्य उदय से शुरू होकर तीसरे प्रहार तक होता है, दिन में एक समय हो भोजन करना चाहिए, नमक नहीं खाना चाहिए ! ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर, घर की सफाई करें, फिर स्नान आदि करके घर में गंगाजल का छिडकाव करें ! उसके बाद व्रत का संकल्प ले और भगवान् शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चहिये ! शिव चालीसा का पाठ करें ! निम्न में से किसी भी मंत्र का 7, 11, 21 माला का उच्चारण करे, शिवलिंग में जल चढ़ाये, बेल पत्र, भांग चन्दन आधी चढ़ाये ! ॐ नमः शिवाय ॐ जूं स : ॐ ह्रीं नमः शिवाय शाम को सूर्य उदय पश्चात् भगवान् शिव की धुप द्वीप और चन्दन से पूजा करें ! पूजा के पश्चात् कथा सुने, आरती करने के वाद भगवान् शिव और देवी पारवती को भोग लगाये, आरती का प्रसाद वितरण करने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करें ! इस तरह से पहले सोमवार से सावन के आखरी सोमवार तक व्रत का पालन करना चाहिए ! माना जाता है कि सावन के महीने में आने वाले सोमवार के व्रत करने से इसका फल 16 सोमवार के फल के बराबर मिलता है ! जो भी भक्त सच्चे मन से सावन का व्रत रखता है और विधि अनुसार पूजा करता है उसे मन वांछित फल प्राप्त होता है ! सावन के व्रत में न करे ये काम सावन के व्रत के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिए, गुस्सा नही करना चाहिए, बुरे विचार मन में नहीं लाने चाहिए और किसी के लिए मुख से अपशव्द नहीं कहने चाहिए ! ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए, अनैतिक कार्य से दूर रहे ! शाश्त्रो के अनुसार बैंगन को अशुद्ध मन जाता है इसलिए इस महीने बैंगन खाने से परहेज़ करें ! मांस मदिरा का सेवन आदि न करें इससे आपको जीव हत्या का पाप लगता है साथ ही मन में अशांति बनती है ! पेड़ पौधों को तोड़ने से पाप लगता है !
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हनुमान जी 11वें रुद्रवतार हैं, दसों दिशाओं में इनकी कीर्ति है, इसके साथ ही बाबा हनुमान जी को मां सीता जी ने अष्ट सिद्धि,और नवनिधि का वरदान दिया हुआ है, जिसके चलते इनके लिये इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है। साथ ही ये चिरंजीवी भी है। इसके अलावा किसी भी प्रकार के ग्रह परिवर्तन हो या ग्रहों का प्रभाव हो, श्री बजरंगबली हर किसी पर असर डालने में सक्षम है। दरअसल नौ ग्रहों में जहां हनुमान जी देवताओं के सेनापति मंगल के कारक देव है। : मंगल ग्रह : हनुमान जी एक ऐसे शक्तिशाली देवता है जिनके प्रताप से कोई भी अंजान नहीं है। माना जाता है कि हनुमान जी का जन्म मंगलवार को हुआ था, वहीं ये स्वयं देवताओं के सेनापति मंगल के कारक देव हैं इसलिए इनकी पूजा करने से मंगल की पीड़ा से मुक्ति मिलने के साथ ही मंगल देव की कृपा बरसने लगती है । - वहीं शनि पर भी इनका प्रभाव चलता है। : शनिदेव : सूर्य पुत्र शनिदेव न्याय के जाने जाते है, जब शनिदेव की दशा चलती है तब ये व्यक्ति को उसके कर्मों के हिसाब से दंड जरूर देते हैं । लेकिन अगर कोई हनुमान जी की शरण में चला जाता है तो शनिदेव का कोप काफी हद तक शांत हो जाता है। ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी को शनिदेव ने वचन दिया हुआ है कि वो उनके भक्तों का कुछ भी नहीं बिगाड़ेंगे । इसलिए हनुमान जी की शरण में जाने से शनिदेव के कोप भाजन से राहत मिलती है। - इसके अलावा सोमवार जिसके कारक देव भगवान शंकर है, हनुमान जी को उनका ही अवतार माना जाता है। - बृस्पतिवार के कारक देव श्री हरी विष्णु हैं, तो वहीं उनके अवतार श्रीराम के हनुमान जी स्वयं परम भक्त है : सूर्य देव : आप सभी ने सुना होगा कि बालक पन में हनुमान जी ने सूर्य देव को फल समझ कर निगल लिया था । जिसके बाद इंद्र के बज्र चलाने के बाद सूर्य देव को मुक्ति मिली थी। लेकिन कम लोगों को ही ये मालूम होगा कि सूर्य देव हनुमान जी के गुरु हैं, हनुमान जी ने सूर्य देव से ही शिक्षा ग्रहण की थी। हनुमान जी के जन्म के समय सूर्य उच्च राशि में थे। इसलिए हनुमान जी की उपासना करने से सूर्य देव भी प्रसन्न हो जाते हैं । वहीं ये मान्यता है कि सूर्य देव की आराधना से चंद्र, बुध, गुरु, ग्रह भी शांत होते हैं और इनकी पीड़ा से मुक्ति मिलती है क्यों कि वो सूर्य देव के मित्र ग्रह हैं । - शुक्र की कारक देवी मां लक्ष्मी हैं और वे ही रामायण काल में सीता का रूप लेकर आईं थी, तब उन्होंने ही हनुमान जी को कई वरदान दिए थे। : शुक्र : हनुमान जी संगीत के महान ज्ञाता, शृंगार प्रिय हैं । इस लिये भक्ति भाव से उनका स्मरण करने और उनका शृंगार करने से वे जल्द खुश हो जाते हैं । इस प्रकार हमें शुक्र ग्रह की पीड़ा से राहत मिलती है । राहु-केतु ग्रहों के कष्टों से मुक्ति ... इसके अलावा राहु और केतु दोनों क्रूर छाया ग्रह हैं, कहा जाता है कि हनुमानजी के भय से राहु भागकर इंद्रदेव की शरण में भाग गया था। हनुमानजी की पूजा और भक्ति करने से इन क्रूर ग्रहों की हिम्मत भी नहीं पड़ती कि वो हनुमान भक्त को कष्ट दें । हनुमानजी इस कलियुग में सबसे ज्यादा शक्तिशाली, जाग्रत और साक्षात देवता हैं। इस युग में हनुमानजी की भक्ति करने मात्र से ही दुखों और संकट रक्षा हो जाती है। हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ भावना होनी बेहद जरूरी है, जितनी आपकी भावना प्रबल होगी, उतनी ही जल्दी आपको हनुमान जी की कृपा प्राप्त होगी। ऐसे करें हनुमान जी की आराधना ? हनुमान जी की आराधना करते समय एक सामान्य भक्त की तरह भावना को प्रबल करते हुए हनुमान जी की पूजा करें। इस समय मन में ये विश्वास जरूर रखें कि आपको उनकी कृपा जरूर मिलेगी। इसके अलावा हनुमान जी की पूजा करते समये कुछ सामान्य बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। इसके तहत सबसे पहले अपने घर में पूजा स्थान पर साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखते हुऐ हनुमान जी के किसी एक रूप की तस्वीर रखें, उनके सामने आसन बिछा लें। इसके बाद दीप जला लें। प्रभु का ध्यान करते हुए धूप, दीप, फल, फूल, मिष्ठान चढ़ाएं । बता दें की यहां हनुमान जी की आराधना करने के लिये आपकी भावना बेहद अहम है। जितनी आपके अंदर भक्ति प्रबल होगी उतनी जल्द ही आपको हनुमान जी की कृपा भी मिलेगी। अगर ब्रह्म मुहूर्त में या फिर शाम को गो-धूलि की बेला में आप हनुमान जी की पूजा करेंगे तो आप पर जरूर कृपा बरसेगी । इस बात का रखें विशेष ध्यान.. चूकिं हनुमान जी भगवान श्री राम जी के अनन्य भक्त हैं, ऐसे में आपको सबसे पहले प्रथम पूज्य गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। कम से कम 11 बार 'ओम गं गणपतये नम :' का जाप कर लें । इसके बाद हनुमान जी का ध्यान करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ कम से कम पांच बार ,या फिर सात बार, या फिर 11 बार करें। हनुमान चालीसा का पाठ करने के बाद भगवान श्रीरामचन्द्र जी का ध्यान करते हुए कुछ देर उनका नाम या फिर भजन करें। हनुमान जी भगवान श्रीराम चन्द्र जी का भजन सुन कर बेहद प्रसन्न हो जाते हैं ।
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