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कस्यैकान्तं सुखम् उपनतं, दु:खम् एकान्ततो वा। नीचैर् गच्छति उपरि च, दशा चक्रनेमिक्रमेण॥ Who has only experienced constant happiness or constant sorrows? Situations in life are similar to a point on the moving wheel which goes up and down regularly. *किसने केवल सुख ही देखा है और किसने केवल दुःख ही देखा है, जीवन की दशा एक चलते पहिये के घेरे की तरह है जो क्रम से ऊपर और नीचे जाता रहता है।* *हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
posted Sep 14 by anonymous

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नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा। शीलं च दुर्लभं तत्र विनयस्तत्र सुदुर्लभः॥ To born as human is rare in this world. To be knowledgeable also is even rarer. To have great character is even more rare . To be humble is the rarest of all. *पृथ्वी पर मनुष्य जन्म मिलना दुर्लभ है, उनमें भी विद्या युक्त मनुष्य मिलना और दुर्लभ है, उनमें भी चरित्रवान मनुष्य मिलना दुर्लभ है और उनमें भी विनयी मनुष्य मिलना और दुर्लभ है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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क्रोधमूलो मनस्तापः क्रोधः संसारबन्धनम्। धर्मक्षयकरः क्रोधः तस्मात्क्रोधं परित्यज॥ Anger is the root cause of mental distress. Anger is the reason for bondage with this world. Anger reduces righteousness, hence give up anger. *क्रोध मन के दुःख का प्राथमिक कारण है, क्रोध संसार बंधन का कारण है, क्रोध धर्म का नाश करने वाला है, इसलिए क्रोध को त्याग दें।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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प्रदोषे दीपकश्चंद्र: प्रभाते दीपको रवि:। त्रैलोक्ये दीपको धर्म: सुपुत्र: कुलदीपक:॥ Moon illumines the evening. Sun illumines the morning. Dharma (Righteousness) illumines all the three worlds and a capable son illumines all ancestors. *शाम को चन्द्रमा प्रकाशित करता है, दिन को सूर्य प्रकाशित करता है, तीनों लोकों को धर्म प्रकाशित करता है और सुपुत्र पूरे कुल को प्रकाशित करता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥ By whose grace dumbs start talking, lame men climb mountains, I worship that Sri Krishna, the supreme bliss. *जिनकी कृपा से गूंगे बोलने लगते हैं, लंगड़े पहाड़ों को पार कर लेते हैं, उन परम आनंद स्वरुप श्रीमाधव की मैं वंदना करता हूँ।* *हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम*।
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*एकमेवाक्षरं यस्तु* *गुरु: शिष्यं प्रबोधयेत्।* *पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं* *यद् दत्वा चाડनृणी भवेत्।।* अर्थात् *गुरु अपने शिष्यों को अद्वितीय ब्रह्मशक्ति, आत्मा-परमात्मा और सच्चे तत्त्वज्ञान का अच्छी तरह बोध कराते हैं, गुरु ही शिष्यों को मिथ्या मोह- माया से हटाकर ब्रह्म का दर्शन कराते हैं।ऐसे गुरुजन का ऋण चुकाने के लिए इस संसार में कोई मूल्यवान पदार्थ नहीं है*। *हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम*
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