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नवरात्रि में नौ देवियों का महत्व

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*जानिए नवरात्रि की 9 देवियां और उनके मंत्र* नवरात्रि की देवी माता दुर्गा के 9 रूपों का उल्लेख श्री दुर्गा सप्तशती के कवच में है जिनकी साधना करने से भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते हैं। कई साधक अलग-अलग तिथियों को जिस देवी की हैं, उनकी साधना करते हैं, जैसे प्रतिपदा से नवमी तक क्रमश: देवियां और उनके मंत्र- *(1) माता शैलपुत्री : प्रतिपदा के दिन इनका पूजन-जप किया जाता है। मूलाधार में ध्यान कर इनके मंत्र को जपते हैं। धन-धान्य-ऐश्वर्य, सौभाग्य-आरोग्य तथा मोक्ष के देने वाली माता मानी गई हैं। *मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:।'* *(2) माता ब्रह्मचारिणी : स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान कर इनकी साधना की जाती है। संयम, तप, वैराग्य तथा विजय प्राप्ति की दायिका हैं। *मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।'* *(3) माता चंद्रघंटा :मणिपुर चक्र में इनका ध्यान किया जाता है। कष्टों से मुक्ति तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए इन्हें भजा जाता है। *मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चंद्रघंटायै नम:।'* *(4) माता कूष्मांडा : अनाहत चक्र में ध्यान कर इनकी साधना की जाती है। रोग, दोष, शोक की निवृत्ति तथा यश, बल व आयु की दात्री मानी गई हैं। *मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्मांडायै नम:।'* *(5) माता स्कंदमाता : इनकी आराधना विशुद्ध चक्र में ध्यान कर की जाती है। सुख-शांति व मोक्ष की दायिनी हैं। *मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमातायै नम:।'* *(6) माता कात्यायनी : आज्ञा चक्र में ध्यान कर इनकी आराधना की जाती है। भय, रोग व शोक-संतापों से मुक्ति तथा मोक्ष की दात्री हैं। *मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायनायै नम:।* *(7) माता कालरात्रि : ललाट में ध्यान किया जाता है। शत्रुओं का नाश, कृत्या बाधा दूर कर साधक को सुख-शांति प्रदान कर मोक्ष देती हैं। *मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:।'* *(8) माता महागौरी : मस्तिष्क में ध्यान कर इनको जपा जाता है। इनकी साधना से अलौकिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं। असंभव से असंभव कार्य पूर्ण होते हैं। *मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्ये नम:।'* *(9) माता सिद्धिदात्री : मध्य कपाल में इनका ध्यान किया जाता है। सभी सिद्धियां प्रदान करती हैं। *मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्यै नम:।'* *विधि-विधान से पूजन-अर्चन व जप करने पर साधक के लिए कुछ भी अगम्य नहीं रहता।* *विधान- कलश स्थापना* देवी का कोई भी चित्र संभव हो तो यंत्र प्राण-प्रतिष्ठायुक्त तथा यथाशक्ति पूजन-आरती इत्यादि तथा रुद्राक्ष की माला से जप संकल्प आवश्यक है। जप के पश्चात अपराध क्षमा स्तोत्र यदि संभव हो तो अथर्वशीर्ष, देवी सूक्त, रात्रिसूक्त, कवच तथा कुंजिका स्तोत्र का पाठ पहले करें। गणेश पूजन आवश्यक है। ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन करने से सिद्धि सुगम हो जाती है। *आप सभी को नवरात्रि कि हार्दिक शुभकामनाएं। जय माता दी।* *ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री*
posted Oct 17 by Ajay Shastri

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शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में भक्त मां को प्रसन्न करने की कोशिश करते है. नवरात्रि में देवी पूजन और नौ दिन के व्रत का बहुत महत्व है. इन नौ दिनों में भक्तों नियमों के साथ मां की पूजा करते हैं. इसबार अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ेगी, जिसके कारण नवरात्र में देवी आराधना के लिए पूरे 9 दिन मिलेंगे. प्रतिपदा तिथि को माता के प्रथम स्वरूप शैल पुत्री के साथ ही कलश स्थापना के लिए भी अति महत्त्वपूर्ण दिन होता है. कलश स्थापना या कोई भी शुभ कार्य शुभ समय एवं तिथि में किया जाना शुभ माना जाता है, इसलिए इस दिन कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त पर विचार किया जाना अत्यावश्यक है. नवरात्र के 9 दिनों में मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और हर स्वरूप सौभाग्य का प्रतीक होता है. इन शुभ दिनों में मां की हर रोज पूजा की जाती है और ज्यादातर लोग 9 दिन का व्रत भी रखते हैं. वैसे तो मां को श्रद्धा भाव से लगाए गए हर भोग को ग्रहण करती हैं लेकिन नवरात्र के दिनों में मां के हर स्वरूप का अलग भोग लगता है. कलश स्था‍पना की तिथि और शुभ मुहूर्त कलश स्था‍पना की तिथि: 17 अक्टूबर 2020 कलश स्था‍पना का शुभ मुहूर्त: 17 अक्टूबर 2020 को सुबह 06 बजकर 23 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक। कुल अवधि: 03 घंटे 49 मिनट अभिजीत मुहूर्त सभी शुभ कार्यों के लिए अति उत्तम होता है। जो मध्यान्ह 11:43 से 12:29 तक होगा। शुभ का चौघड़िया सुबह 07:49 से 09:14 तक होगा जिसने कलश स्थापना की जा सकती है स्थिर लग्न कुम्भ दोपहर 2:30 से 3:55 तक होगा, साथ ही शुभ चौघड़िया भी इस समय प्राप्त होगी, अतः यह अवधि कलश स्थापना हेतु अतिउत्तम है। जानिए कैसे करें नवरात्रि पर कलश पूजन सभी प्राचीन ग्रंथों में पूजन के समय कलश स्थापना का विशेष महत्व बताया गया है. सभी मांगलिक कार्यों में कलश अनिवार्य पात्र है. दुर्गा पूजन में कलश की स्थापना करने के लिए कलश पर रोली से स्वास्तिक और त्रिशूल अंकित करना चाहिए और फिर कलश के गले पर मौली लपेट दें. जिस स्थान पर कलश स्थापित किया जाता है पहले उस स्थान पर रोली और कुमकुम से अष्टदल कमल बनाकर पृथ्वी का स्पर्श करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- ओम भूरसि रस्यादितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धात्रीं। पृथिवीं यच्छ पृथिवी दृह पृथ्वीं माहिसीः।। ओम आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्तिवन्दवः। पुनरूर्जानि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः।।
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*सावन माह में रुद्राभिषेक का महत्व* शिव पुराण के रूद्रसंहिता में बताया गया है सावन के महीने में रुद्राभिषेक करना विशेष फलदाई है।लेकिन इस वर्ष कोरोना संकट के कारण आप घर पर ही यह पवित्र अभिषेक कर सकते हैं। *सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा शिवात्मका* *अर्थात* सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित है और सभी देवता रूद्र की आत्मा में हैं। जैसा कि मंत्र में साफ लिखा है की *रुद्र ही सर्वशक्तिमान है।* रुद्राभिषेक में भगवान शिव के रूद्र अवतार की पूजा होती है। यह भगवान शिव का प्रचंड रूप है समस्त ग्रह बाधाओं और समस्याओं का नाश करता है। "महाविद्याक्षरा ज्योतिष संस्थान" के संचालक अजय शास्त्री ने बताया है *सावन के महीने में रुद्र ही सृष्टि का कार्य संभालते हैं* इसलिए इस समय रुद्राभिषेक अधिक और तुरंत फलदाई होता है इससे अशुभ ग्रहों के प्रभाव से जीवन में चल रही परेशानी भी दूर होती हैं परिवार में सुख समृद्धि और शांति आती है। *स्वर्णम् कोटि गुणं महम्* *अर्थात* सोने के शिवलिंग से भी करोड़ गुना पारद शिवलिंग का महत्व है।ज्योतिषाचार्य जी ने बताया है कि *शनि की साढ़ेसाती,ढैया व महादशा में मिलेगी राहत* 18 जुलाई व 1 अगस्त को प्रदोष है इन दोनों ही तारीखों को शनिवार है सावन माह के शनि प्रदोष व्रत करने से व भगवान भोलेनाथ का अभिषेक पूजन करने से शनि ग्रह के दोषों से मुक्ति मिलती है। *कालसर्प दोष से मिलेगी मुक्ति* 25 जुलाई शनिवार को नाग पंचमी है जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष है उनको चांदी के नाग नागिन सहित भगवान भोलेनाथ का अभिषेक पूजन करना चाहिए। *पूर्ण होती हैं मनोकामनाएं* शास्त्री जी के अनुसार सावन में भोलेनाथ का गन्ने के रस से अभिषेक करने पर लक्ष्मी प्राप्ति, दूध से मनोकामनाएं पूर्ण, घी से आरोग्यता व वंश वृद्धि, इत्र युक्त जल से बीमारी नष्ट होती है। सरसों के तेल से शत्रु नाश, दही से भवन वाहन प्राप्ति, तथा शहद युक्त जल से अभिषेक करने पर समस्त पापों का नाश होता है *सावन मास 6 जुलाई से शुरू होकर 3 अगस्त रक्षाबंधन तक रहेगा!*
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6 जुलाई से सावन का महिना शुरू गया है भोलेनाथ को ये महिना अति प्रिय है इस दिन देवो के देव महादेव यानी भगवान् शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना की जाती है और इनकी पूजा अत्यन्य फलदायी होती है इस वार सावन के महीने में 5 सोमवार होंगे यानि सावन 6 जुलाई से शुरू होकर 3 अगस्त को ख़त्म होगा ! ऐसा माना जाता है कि सावन के महीने में भगवान् शिव की पूजा करने से जीवन के कष्टों से निवारण मिलता है ! सच्चे मन से भगवान् शिव की आराधना करने से मन वांछित फल मिलता है ! सावन का व्रत शुरू करने की विधि सोमवार का व्रत सूर्य उदय से शुरू होकर तीसरे प्रहार तक होता है, दिन में एक समय हो भोजन करना चाहिए, नमक नहीं खाना चाहिए ! ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर, घर की सफाई करें, फिर स्नान आदि करके घर में गंगाजल का छिडकाव करें ! उसके बाद व्रत का संकल्प ले और भगवान् शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चहिये ! शिव चालीसा का पाठ करें ! निम्न में से किसी भी मंत्र का 7, 11, 21 माला का उच्चारण करे, शिवलिंग में जल चढ़ाये, बेल पत्र, भांग चन्दन आधी चढ़ाये ! ॐ नमः शिवाय ॐ जूं स : ॐ ह्रीं नमः शिवाय शाम को सूर्य उदय पश्चात् भगवान् शिव की धुप द्वीप और चन्दन से पूजा करें ! पूजा के पश्चात् कथा सुने, आरती करने के वाद भगवान् शिव और देवी पारवती को भोग लगाये, आरती का प्रसाद वितरण करने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करें ! इस तरह से पहले सोमवार से सावन के आखरी सोमवार तक व्रत का पालन करना चाहिए ! माना जाता है कि सावन के महीने में आने वाले सोमवार के व्रत करने से इसका फल 16 सोमवार के फल के बराबर मिलता है ! जो भी भक्त सच्चे मन से सावन का व्रत रखता है और विधि अनुसार पूजा करता है उसे मन वांछित फल प्राप्त होता है ! सावन के व्रत में न करे ये काम सावन के व्रत के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिए, गुस्सा नही करना चाहिए, बुरे विचार मन में नहीं लाने चाहिए और किसी के लिए मुख से अपशव्द नहीं कहने चाहिए ! ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए, अनैतिक कार्य से दूर रहे ! शाश्त्रो के अनुसार बैंगन को अशुद्ध मन जाता है इसलिए इस महीने बैंगन खाने से परहेज़ करें ! मांस मदिरा का सेवन आदि न करें इससे आपको जीव हत्या का पाप लगता है साथ ही मन में अशांति बनती है ! पेड़ पौधों को तोड़ने से पाप लगता है !
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आमतौर पर हमारे देश में हर विशेष दिन कुछ न कुछ दान करने की परंपरा रही है। महाभारत के एक दृष्टांत में कहा गया है कि माघ मास के दिनों में अनेक तीर्थों का समागम होता है, वहीं पद्मपुराण में कहा गया है कि अन्य मास में जप, तप और दान से भगवान विष्णु उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि वे माघ मास में स्नान करने से होते हैं। यही वजह है कि प्राचीन ग्रंथों में नारायण को पाने का सुगम मार्ग माघ मास के पुण्य स्नान को बताया गया है, विशेषकर आज के दिन गंगा स्नान का खास महत्व माना गया है। * माघ मास में पवित्र नदियों में स्नान करने से एक विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है। * अमावस्या के दिन जप-तप, ध्यान-पूजन करने से विशेष धर्मलाभ प्राप्त होता है। * मौनी अमावस्या के दिन मौन रहकर आचरण तथा स्नान-दान करने का विशेष महत्व है। * शास्त्रों के अनुसार माघ मास में पूजन-अर्चन व नदी स्नान करने से भगवान नारायण को प्राप्त किया जा सकता है तथा इन दिनों नदी में स्नान करने से स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग मिल जाता है। * जो लोग घर पर स्नान करके अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन्हें पानी में थोड़ा-सा गंगाजल मिलाकर तीर्थों का आह्वान करते हुए स्नान करना चाहिए। * इस दिन सूर्यनारायण को अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होती है। * जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, व गाय को दही और चावल खिलाएं तो मानसिक शांति प्राप्त होगी। * आज के दिन 108 बार तुलसी परिक्रमा करें। * इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है। * इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। क्या करें दान :- मौनी अमावस्या के दिन तेल, तिल, सूखी लकड़ी, कंबल, गरम वस्त्र, काले कपड़े, जूते दान करने का विशेष महत्व है। वहीं जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा नीच ग्रह का है तो उन्हें दूध, चावल, खीर, मिश्री, बताशा दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होगी।
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इस वर्ष 15 जनवरी 2020 को मकर सक्रांति का पावन पर्व मनाया जाएगा, सबसे पहले जानते हैं कि सक्रांति होती क्या है और उसमें भी मकर सक्रांति किसे कहते हैं सूर्य का किसी विशेष राशि में जाना या गोचर करना सक्रांति कहलाता है जब सूर्य किसी खास राशि में भ्रमण करते हैं तो उसे सक्रांति कहते हैं जैसे मेष राशि में जाएंगे तो मेष सक्रांति वृष राशि में सूर्य भ्रमण करेंगे तो उसे वृष सक्रांति कहा जाएगा इसी तरह से जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे तो उसे मकर सक्रांति कहा जाता है सूर्य लगभग 1 महीने तक एक राशि में रहते हैं और 1 महीने के बाद वह दूसरी राशि में गोचर करते हैं और कुल मिलाकर 12 राशियां होती है तो वर्ष में 12 सक्रांति होती है लेकिन सभी सक्रांति मे दो सक्रांतियों का विशेष महत्व होता है उनमें से एक है मकर संक्रांति और एक है कर्क संक्रांति !मकर संक्रांति यानी जब सूर्य मकर राशि में जाते हैं और कर्क सक्रांति को कर्क राशि में जाते हैं , मकर संक्रांति से अग्नि तत्व की शुरुआत होती है यानी मौसम और वातावरण में गर्मी आनी शुरू होती है क्योंकि सूर्य जब 14 और 15 जनवरी के आसपास मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो मौसम में धीरे-धीरे गर्माहट होनी शुरू हो जाती है और अग्नि तत्व का प्रभाव आना शुरू होता है !कर्क संक्रांति है जो तकरीबन जुलाई में आती है उससे जल तत्व की शुरुआत होती है यहां से बरसाती मौसम और धीरे-धीरे सर्दियां शुरू हो जाती है तो जुलाई से कर्क सक्रांति और जनवरी से मकर सक्रांति की शुरुआत होती है इस समय सूर्य उत्तरायण होते हैं सूर्य के पास दो आयन है उत्तरायण और दक्षिणायन सूर्य जुलाई के बाद दक्षिणायन में चले जाते हैं जिसे दैत्यों का समय भी कहा जाता है और जब सूर्य जनवरी के समय मकर सक्रांति में उत्तरायण होते हैं तो उसे देवताओं का समय कहा जाता है उत्तरायण सूर्य को बेहद शुभ माना जाता है ! हम अपने पर्व और त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार बनाते हैं जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे तभी मकर सक्रांति मानी जाएगी 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाए जाने के पीछे एक बड़ी वजह यह है कि इस साल सूर्य का मकर राशि में आगमन 14 जनवरी मंगलवार की मध्य रात्रि के बाद रात 2 बजकर 7 मिनट पर हो रहा है। मध्य रात्रि के बाद संक्रांति होने की वजह से इसके पुण्य काल का विचार अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त से लेकर दोपहर तक होगा।इस लिये मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाना ज्यादा बेहतर होगा! मकर सक्रांति और ज्योतिषीय महत्व अब जानेंगे कि मकर सक्रांति का ज्योतिष से क्या संबंध है ज्योतिष शास्त्र मे सूर्य और शनि का संबंध इस पर्व से होने से यह पर्व काफी महत्वपूर्ण है ऐसा माना जाता है कि सूर्य इस त्यौहार पर अपने पुत्र शनि से मिलने के लिए आते हैं क्योंकि मकर राशि शनिदेव की है इसके अलावा शुक्र मकर सक्रांति पर उदय हो जाते हैं शुभ कार्य की शुरुआत हो जाती है मकर सक्रांति एक ऐसा दिन है जिस दिन उपायों द्वारा सूर्य और शनि के बुरे प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है मकर सक्रांति पर नया अनाज भी आता है और उस नए अनाज से से नवग्रह की पूजा की जाती है जिससे कि पारिवारिक शांति बनी रहे इस तरह मकर सक्रांति सूर्य और शनि दोनों की कृपा प्राप्त करने का दिन है मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं इसलिए बहुत खास माना जाता है भीष्म पितामह जब बाणों की शैया पर लेटे हुए थे उन्होंने भी इस चीज को बहुत ध्यान में रखते हुए दक्षिणायन सूर्य में अपना शरीर नहीं त्यागा जैसे ही सूर्य उत्तरायण हुए तभी अपने शरीर का त्याग किया उत्तरायण सूर्य की महत्ता काफी बढ़ जाती है और यही कारण है कि इस दिन के लिए दान पुण्य का बहुत महत्व माना जाता है भारत में मकर संक्रांति का बहुत गहरा धार्मिक महत्व है। इसके अलावा ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों को पराजित किया था। कहा जाता है कि भगवान ने असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। ऐसे में इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी मानाया जाता है। क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है।ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य और शनि का तालमेल संभव नहीं है, क्योंकि दोनों आपस में शत्रु का भाव रखते हैं लेकिन इस दिन सूर्य खुद अपने पुत्र के घर जाते हैं। इसलिए इस त्यौहार के पीछे पिता-पुत्र के संबंधों को भी माना जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार गंगा को महाराज भगीरथ ने इस दिन अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए इस दिन गंगा में स्नान करने को पवित्र समझा जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से व्यक्ति का पुण्य प्रभाव हजार गुना बढ़ जाता है। इस दिन से मलमास खत्म होने के साथ शुभ माह प्रारंभ हो जाता है। इस खास दिन को सुख और समृद्धि का दिन माना जाता है।मकर संक्राति के दिन विशेष रूप से गंगा स्नान का महत्व है। उत्तर प्रदेश और उससे सटे राज्यों में इसे खिचड़ी' भी कहते हैं। इस दिन पवित्र नदियों में डुबकी लेना सबसे शुभ माना जाता है। कहते हैं कि इस अवसर पर गंगा स्नान करने से इंसान के सारे पाप धुल जाते हैं। वैसे तो इस मौके पर पूरे देश में मेला लगता है लेकिन प्रयागराज (इलाहाबाद) में इस दौरान एक महीना माघ मेला चलता है। हर साल गंगा सागर में एक बहुत बड़ा मेला आयोजित किया जाता है। पुराणों में मकर संक्रान्ति का काफी विस्तार से वर्णन मिलता है। पौराणिक विवरण के अनुसार, उत्तरायण देवताओं का एक दिन एवं दक्षिणायन एक रात्रि मानी जाती है। मकर सक्रांति के दिन आपको दो ग्रहों का वरदान मिल सकता है सूर्य और सूर्य पुत्र शनि से लाभ पाने के लिए विशेष चीजों से विशेष प्रयोग किए जाएं तो शुभ फल मिलेगा मकर सक्रांति पर किए जाने वाले शुभ कर्मों में सबसे पहले प्रात काल स्नान कर लेना चाहिए 1. तांबे के पात्र में पानी भरकर लाल फूल, अक्षत, कुमकुम डालकरी सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए और सूर्य के बीज मंत्र का 108 बार जप कीजिए( ओम घृणि सूर्याय नमः) 2. श्रीमद्भागवत के 1 अध्याय का पाठ करें गीता का पाठ करें और अगर पूरी गीता का पाठ नहीं कर पाते तो गीता के 11 अध्याय का पाठ करें 3. नई अनाज का खासतौर से दाल ,चावल का खिचड़ी, तिल, गुड, तांबा ,लाल वस्त्र ,कंबल का ,मोटे कपड़ों का और शुद्ध देसी घी, गेहूं का दान किसी निर्धन व्यक्ति को इस दिन जरूर करें 4. भोजन में नए अनाज, काली दाल व चावल की खिचड़ी बनाएं प्याज लहसुन आदि का प्रयोग ना करें सात्विक भोजन बनाए भगवान को भोग लगाएं और इसके बाद इसको प्रसाद रूप में ग्रहण करें और अपने घर में परिवार में बांटे तो आपके लिए बहुत शुभ होगा 5. लोहे के बर्तन में या कटोरी में काले तिल रखकर 108 बार ओम शं शनिश्चराय नमः मंत्र का जाप करके उसे निर्धन व्यक्ति को दान कर दीजिए इस उपाय से शनि से मिल रही पीड़ा से मुक्ति मिलेगी अगर तिल और गुड़ के लड्डू या मिठाई किसी गरीब को दी जाए तो आपकी कुंडली की खराब सूर्य और शनि बेहतर हो जाते हैं 6. मकर सक्रांति पर नये अनाज की खिचड़ी खाने से पूरे वर्ष आरोग्य की प्राप्ति होती है खिचड़ी खाने से व बाटंने से आपके सारे ग्रह मजबूत होते हैं सूर्य अगर कुंडली में खराब है तो शाम को अन्न का सेवन नहीं करना चाहिएयह सब उपाय करने से कुंडली के बिगड़े हुए सूर्य निश्चित रूप से बेहतर होगा सूर्य देव की कृपा बरसेगी और शुभ फल मिलेगा
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