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posted Dec 12, 2020 by Rakesh Periwal

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1-जुलाई 2020, से चातुर्मास प्रारंभ हो रहा है। इस बार यह चातुर्मास 4 की जगह कुल 5 महीने, या यूँ कहिये कुल 148 दिनों लंबा चलने वाला है। इसके साथ ही इस चातुर्मास को ख़ास भी माना जा रहा है, और वजह है 160 साल बाद, लीप ईयर और अधिकमास का एक साथ बनता संयोग। बता दें कि इससे पहले साल 1860, में ऐसा संयोग बना था जब लीप ईयर और अधिकमास साथ एक वर्ष में आये थे।इस दौरान सभी तरह के मांगलिक कार्य, विशेषतौर पर शादी और मुंडन संस्कार वर्जित माने जाते हैं। आइये सबसे पहले जानते हैं कि चातुर्मास होता क्या है? सावन, भाद्रपद,आश्विन और कार्तिक, हिन्दू धर्म में इन चार महीनों के इस समय (चातुर्मास) को बेहद ख़ास माना जाता है। इन महीनों में व्रत-उपवास, जप-तप का विशेष महत्व बताया गया है। बता दें कि देवशयन एकादशी के दिन से ही चातुर्मास की शुरुआत होती है, और इसका अंत कार्तिक के देव प्रबोधिनी एकादशी को होता है। हिन्दू मान्यता के अनुसार यह वो चार महीने होते हैं जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन रहते हैं, और इसी वजह के चलते इन महीनों के दौरान कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य करना वर्जित माना गया है क्या है चातुर्मास का महत्व? हिन्दू मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास का अपना महत्व बताया गया है। इस वर्ष 4 महीने की जगह चातुर्मास पांच महीने का होने जा रहा है। यानि 1 जुलाई से शुरू होकर यह समय 25 नवंबर तक चलेगा, इसके बाद 26 नवंबर को इसकी समाप्ति से पुनः मांगलिक कार्यों की शुरुआत की जा सकेगी। इस वर्ष दो आश्विन मास होने की वजह से चातुर्मास की समय अवधि में तब्दीली आई है। जानकारी के लिए बता दें कि इस वर्ष, श्राद्ध पक्ष के बाद आने वाले सभी त्यौहार 20 से 25 दिन देरी से आएंगे। इस साल सभी त्यौहार भी देरी से आयेंगे अन्य साल के हिसाब से बात करें तो, जैसे ही श्राद्ध ख़त्म होता था, उसके अगले ही दिन नवरात्रि प्रारंभ हो जाती थी, लेकिन इस वर्ष ऐसा नहीं होगा। तारीख़ के हिसाब से समझाएं तो, इस वर्ष 17 सितम्बर 2020, को श्राद्ध ख़त्म होंगे, लेकिन इसके अगले ही दिन से अधिकमास की शुरुआत हो जाएगी। इसके बाद यह अधिकमास 16 अक्टूबर तक चलेगा। 17-अक्टूबर, 2020 से फिर नवरात्रि प्रारंभ होगी। नवरात्रि के बाद 26 अक्टूबर को दशहरा का पर्व मनाया जायेगा और फिर 14-नवंबर को दिवाली मनाई जाएगी। और अंत में 25 नवंबर 2020, को देवउठनी एकादशी के साथ चातुर्मास की समाप्ति हो जाएगी । कहा जाता है कि, चातुर्मास का उपयुक्त फल प्राप्त करने के लिए इन चार महीनों में जप-तप और शुभ काम में अपना समय व्यतीत करना चाहिए। इस दौरान मांगलिक कार्य, शादी, मुंडन, ग्रह-प्रवेश इत्यादि तो वर्जित माने ही गए हैं, साथ ही इस समय यात्रा करने से भी बचना चाहिए। चातुर्मास के बाद शादी-विवाह पुनः किये जा सकेंगे वैसे तो यह पूरा ही समय बेहद शुभ माना गया है लेकिन इनमें से भी सावन का महीना सबसे महत्वपूर्ण होता है। मान्यता के अनुसार जो कोई भी इंसान इस माह में भागवत कथा का पाठ, भगवान शिव का पूजा, धार्मिक अनुष्ठान, या दान-पुण्य करता है उसे अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। बताया जाता है कि जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं तो वो श्रृष्टि का सारा कार्यभार भगवान शिव को सौंप देते हैं, और यही वजह है कि इस समय भगवान शिव और उनके परिवार की पूजा का अत्यधिक महत्व होता है।
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राहु की महादशा के फल देखने के लिए सबसे पहले राहु किस भाव मे किस राशि मे बैठा है उन बातों पर भी ध्यान देना जरूरी होता है।राहु की महादशा शुरू होते ही जीवन मे बड़ा परिवर्तन होने लगता है अब यह परिवर्तन उस भाव से संबंधित होगा जिस भाव मे राहु बेठा होगा।जिस भाव मे जिस राशि मे राहु बेठा है उस राशि के स्वामी की शुभ या अशुभ स्थिति का प्रभाव भी राहु के ऊपर पड़ेगा।राहु शुभ और अच्छी स्थिति में जन्मकुंडली में बेठा है तब इसकी महादशा लगते ही या राहु अंतरदशा भी अच्छा परिवर्तन करके शुभ फल देगी।राहु का कोई अपना कुंडली मे भाव नही होता इस कारण यह जिस भाव मे बैठेगा उसी भाव और जिन ग्रहो के साथ संबंध बनाएगा उन्ही ग्रहो से संबंधित फल जीवन मे करेगा।राहु शुभ है तब इसकी महादशा जीवन को सुखद बनाएगी और अशुभ हुआ तब जीवन को कष्टकारी।अब कुछ उदाहरणों से राहु महादशा को समझते है।। उदाहरण1:- मेष लग्न की कुंडली मे राहु दसवे भाव मकर राशि मे बेठा है अब यहाँ राहु अकेला बेठा हो तब किसी ग्रह से भी इसका कोई संबंध न हो तब यह कार्य छेत्र/नोकरी/व्यापार में बड़ा परिवर्तन कर देगा और यह परिवर्तन अच्छा होगा।राहु के साथ कोई ऐसा ग्रह भी बेठा हो को लाभ देने वाला हो और वह शुभ स्थिति में है तब दिन दुगनी रात चौगनी जैसी तरक्की देगा।। उदाहरण2:-वृष लग्न की कुंडली के दूसरे भाव मे यह उच्च होकर बैठेगा क्योंकि वहाँ इसकी उच्च राशि मिथुन आएगी ऐसी स्थिति में यह अपनी महादशा या अंतरदशा के समय यदि जिस ग्रह की महादशा है वह शुभ है तब राहु की अंतरदशा बेहद धनः दायक फल देगी।जातक का आर्थिक स्तर कुछ ही समय मे आसमान की उचाइयो तक जाएग क्योंकि राहु धनः भाव मे है और राहु का काम सिर्फ और सिर्फ दूसरे भाव(धनः भाव) को विशेष रूप से प्रभावित करना है।। उदाहरण3:- राहु वर्गोत्तम स्थिति में बैठकर राजयोगकारक, या कुंडली के कारक ग्रहो या विपरीत राजयोग कारण ग्रहो से संबंध बनाकर बैठा है तब इसकी दशा अत्यंत सहायक और कामयाबी देने वाली होगी, जैसे, मेष लग्न में बुध 6वे भाव का स्वामी होकर 8वे भाव मे राहु से युति किया होगा तब राहु की यह महादशा या दशा विपरीत राजयोग कारक बन कर आर्थिक, सामाजिक, व्यवसायिक कई तरह से शुभ फल देगी।। राहु नीचराशि गत, भाव और भावेश दोनो को पीड़ित करने पर जैसे नवमेश के साथ नवम भाव मे ही बेठा हो, अशुभ भावेश के साथ शुभ या धन कारक भाव मे हो जैसे अष्टमेश के साथ किसी केंद्र त्रिकोण या धन भाव में बैठेगा तब इसकी महादशा हो या अंतरदशा यह बेहद नुकसान देने वाली और दुखद रहोगी।इसके अलावा शुभ और बलवान राहु की महादशा जीवन को नया मार्गदर्शन देकर चमकाने देगी।इस तरह से राहु या राहु की महादशा फल बहुत तेज गति से देती है जिसका प्रभाव जातक के जीवन मे बदलाब कराता है।
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★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। ★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। ★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। ★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं। ★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। ★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए। ★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं। ★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए। ★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। ★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, ★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। ★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए। ★ देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें। ★ किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए। ★ एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए । ★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं। ★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं। ★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती। ★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे। ★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे। ★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं। ★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें। ★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें। ★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। ★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें। ★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे। ★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं। ★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है। ★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं। ★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए। ★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें। ★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें। ★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।
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ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों का जन्म शुक्रवार को हुआ है उन पर माँ लक्ष्मी और शुक्र दोनों का शुभ प्रभाव देखने को मिलता है, क्योंकि शुक्रवार के स्वामी शुक्र देव है और इसकी देवी लक्ष्मी है। यही कारण है कि इस दिन जन्म लने वाले व्यक्ति भौतिक सुख सुविधाओं के आदी और शौकीन मिजाज होते है l शुक्रवार को जन्मे लोग जीवन को मौज मस्ती से व्यतीत करने के पक्षधर होते है। इस दिन जन्मे लोग विरोधियों को भी अपने पक्ष में करने की कला जानते है, इनमे एक अलग ही आकर्षण होता है। जिससे ये अपने मित्रों के दायरे में काफी लोकप्रिय होते है। शुक्रवार को जन्में लोग बड़े ही खुशमिजाज होते है और जिंदगी को एक जश्न की तरह जीते है। इनको कलात्मक चीजों और कला से गहरा लगाव होता है, इसलिये ये अपना कैरियर भी संगीत, लेखन, चित्रकला, फिल्म, फैशन, ब्यूटी इंडस्ट्री में बनाना पसंद करते है। ऐसे व्यक्ति आमतौर पर प्रसन्न दिखाई देते है। इनके चेहरे पर रौनक होती है।
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