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मकर संक्रांति के बारे में जाने

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मकर संक्रांति कब और क्यों संपादित करें हर बार की तरह इस बार भी मकर संक्रांति की सही तारीख को लेकर उलझन की स्थिति बनी हुई है कि मकर संक्रांति का त्योहार इस बार 14 जनवरी को मनाया जाएगा या 15 जनवरी को। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस वर्ष 15 जनवरी को मकर संक्रांति का त्योहार मनाना चाहिए। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। हिन्दू पंचांग और धर्म शास्त्रों के अनुसार सूर्य का मकर राशी में प्रवेश 14 की शाम को हो रहा हैं। शास्त्रों के अनुसार रात में संक्रांति नहीं मनाते तो अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उत्सव मनाया जाना चाहिए। इसलिए मकर संक्रांति 14 की जगह 15 जनवरी को मनाई जाने लगी है। अधिकतर 14 जनवरी को मनाया जाने वाला मकर संक्रांति का त्यौहार इस वर्ष भी 15 जनवरी को मनाया जाएगा।[3] मकर संक्रान्ति का महत्व संपादित करें पोंगल के लिए पारम्परिक परिधान में एक तमिल बालिका शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है- माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम। स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥ मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्ट
posted Jan 13 by Brajesh Shastri

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जाने पूर्वजन्म के बारे में मनुष्य जन्म लेते ही पूर्व जन्म के परिणामों को भोगने लगता है। पूर्वजन्म के हमारे कर्मफल हमें मिलते रहते हैं।   हर मनुष्य का जीवन पूर्वजन्म के कर्मों के भोग की कहानी है, इनसे कोई भी बच नहीं सकता।   जन्म लेते ही हमारे कर्म हमें उसी तरह से ढूंढने लगते हैं, जैसे बछड़ा झुंड में अपनी मां को ढूढ़ निकालता है |   पिछले कर्म किस तरह से हमारी जन्मकालीन दशाओं से जुड़ जाते हैं, यह किसी भी व्यक्ति की कुंडली में आसानी से देखा जा सकता है।   कुंडली के प्रथम, पंचम और नवम भाव हमारे पूर्वजन्म, वर्तमान तथा भविष्य के सूचक हैं।   इसलिए जन्म के समय हमें मिलने वाली महादशा/ अंतर्दशा/ प्रत्यंतर्दशा का संबंध इन तीन भावों में से किसी एक या दो के साथ अवश्य जुड़ा होता है।   यह भावों का संबंध जन्म दशा के किसी भी रूप से होता है – चाहे वह महादशा हो या अंतर्दशा हो अथवा प्रत्यंतर्दशा। दशा तथा भावों के संबंध के इस रहस्य को जानने की कोशिश करते हैं पंचम भाव से।   पंचम भाव, पूर्व जन्म को दर्शाता है।   यही भाव हमारे धर्म, विद्या, बुद्धि तथा ब्रह्म ज्ञान का भी है। नवम भाव, पंचम से पंचम है अतः यह भी पूर्व जन्म का धर्म स्थान और इस जन्म में हमारा भाग्य स्थान है।   इस तरह से पिछले जन्म का धर्म तथा इस जन्म का भाग्य दोनों गहरे रूप से नवम भाव से जुड़ जाते हैं।   यही भाव हमें आत्मा के विकास तथा अगले जन्म की तैयारी को भी दर्शाता है।   जिस कुंडली में लग्न, पंचम तथा नवम भाव अच्छे अर्थात मजबूत होते हैं वह अच्छी होती है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण के अनुसार ”धर्म की सदा विजय होती है“।   द्वादश भाव हमारी कुंडली का व्यय भाव है। अतः यह लग्न का भी व्यय है। यही मोक्ष स्थान है। यही भाव पंचम से अष्टम होने के कारण पूर्वजन्म का मृत्यु भाव भी है। मरणोपरांत गति का विचार भी फलदीपिका के अनुसार इसी भाव से किया जाता है। दशाओं के रूप में कालचक्र निर्बाध गति से चलता रहता है।   पद्मपुराण के अनुसार जो भी कर्म मानव ने अपने पिछले जन्मों में किए होते हैं उसका परिणाम उसे भोगना ही पड़ेगा“। कोई भी ग्रह कभी खराब नहीं होता, ये हमारे पूर्व जन्म के बुरे कर्म होते हैं जिनका दंड हमें उस ग्रह की स्थिति, युति या दशा के अनुसार मिलता है।* इसलिए हमारे सभी धर्मों ने जन्म मरण के जंजाल से मुक्ति की कामना की है। जन्म के समय पंचम, नवम और द्वादश भावों की दशाओं का मिलना निश्चित होता है। ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय वाराणसी 9450537461
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यदि जन्म पत्रिका (कुंडली) का अध्ययन करते समय इन सबका ध्यान रखा जाए तो भावी जीवनसाथी की झलक पहले से ही मिल सकती है..जेसे—- * सप्तम भाव में शनि हो तो अपनी उम्र वाला वर मिलेगा, रंग सांवला भी हो सकता है। * सप्तमेश शुक्र उच्च का होकर द्वादश भाव में हो तो जन्म स्थान से दूर विवाह होगा, लेकिन पति सुंदर होगा। * सप्तम भाव में मंगल उच्च का हो तो ऐसी कन्या को वर उत्तम, तेजस्वी स्वभाव का, पुलिस या सेना में काम करने वाला मिल सकता है। * सप्तम भाव में धनु का गुरु हो तो ऐसी कन्या को मिलने वाला वर सुंदर, गुणी, उद्यमी या वकील, शिक्षक या बैंककर्मी भी हो सकता है। * मंगल के साथ शनि हो तो ऐसी कन्या को वियोग का योग होता है। * शुक्र-शनि साथ हो तो ऐसी कन्या को वर सांवला, सुंदर, आकर्षक, इंजीनियर या चिकित्सा के क्षेत्र में मिलेगा। धनवान भी हो सकता है। * सप्तमेश सप्तम भाव में उच्च का हो तो ऐसी कन्या का वर भाग्यशाली होगा, लेकिन विवाह बाद उसे अधिक लाभ रहेगा। – यदि मेष लग्न हो और सातवें भाव में शुक्र हुआ तो लाइफ पार्टनर सुंदर होगा, वहीं वह फाइनेंशियली साउंड भी होगा। – वृषभ लग्न हो और सप्तम भाव में मंगल हो व चंद्र लग्न में हो तो वह जीवनसाथी उग्र स्वभाव का होगा लेकिन धन के मामलों में सौभाग्यशाली होगा। – मिथुन लग्न हो और सप्तम भाव का मालिक भी सातवें भाव में ही बैठा हो तो ऐसी पत्रिका ‍जिसकी होगी वह ज्ञानी, न्यायप्रिय, मधुरभाषी, परोपकारी, धर्म-कर्म को मानने वाला या वाली होगी। – कर्क लग्न वालों के लिए शनि सप्तम भाव में या सप्तमेश उच्च का होकर चतुर्थ भाव में हो तो वह साँवला या साँवली होगी, लेकिन जीवनसाथी सुंदर होगा या होगी व शनि उच्च का हुआ तो विवाह सुख उत्तम मिलेगा। – सिंह लग्न हो और सप्तमेश सप्तम में हो या उच्च का हो तो वह साधारण रंग-रूप की होगी पर उसका पति या पत्नी पराक्रमी होगें लेकिन भाग्य में रुकावटें आएँगी। – कन्या लग्न हो और सप्तम भाव में गुरु हो तो पति या पत्नी सुंदर मिलता है। स्नेही व उत्तम संतान सुख मिलेगा। ऐसी स्थिति वाला प्रोफेसर, जज, गजेटेट ऑफिसर भी हो सकता है। लाइफ पार्टनर सम्माननीय होगा। – तुला लग्न हो और सप्तम भाव में मेष का मंगल हो तो वह उग्र स्वभाव, साहसिक, परिवार से अलग रहने वाली होगा। लाइफ पार्टनर की पारिवारिक स्थिति मध्यम होगी व नौकरी या व्यापार में बाधा होगी। – वृश्चिक लग्न हो और सप्तम भाव में शुक्र हो तो स्वराशि का होने से उसे सुसराल से धन मिलेगा। पति पत्नी से लाभ पाने वाला और पत्नी पति से लाभ पाने वाली होगी। – धनु लग्न हो और सप्तम भाव में बुध हो तो लाइफ पार्टनर समझदार, विद्वान, विवेकी, पढ़ी-लिखा होगा। अगर पत्रिका लड़के की है तो लड़की सर्विस में हो सकती है। – मकर लग्न हो और चंद्रमा सप्तम भाव में हो तो ऐसा युवा सुंदर, सॉफ्ट स्पोकन, शांतिप्रिय होगा। लाइफ पार्टनर बेहद खूबसूरत होगा। – कुंभ लग्न हो और सप्तम भाव में सूर्य हो तो वह साहसिक, महत्वाकांक्षी, तेजस्वी स्वभाव की होगी व हुकूमत करने वाली होगी। परिवार से भी अलग हो सकती है। – मीन लग्न हो और सप्तम में उच्च का बुध हो तो वह युवा प्रतिष्ठित होगा, ऐसी प्लेनेट कंडीशन वाली वाली युवती पढ़ी-लिखी, समझदार, माता-पिता, भूमि-भवन से लाभ पाने वाली होगी। परिवार में सम्माननीय होगी
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#हिंदुओं #जानो #अपने #धर्म और #संस्कृति के #बारे #मे *पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -* *1. युधिष्ठिर 2. भीम 3. अर्जुन* *4. नकुल। 5. सहदेव* *( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )* *यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन* *की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।* *वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..* *कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -* *1. दुर्योधन 2. दुःशासन 3. दुःसह* *4. दुःशल 5. जलसंघ 6. सम* *7. सह 8. विंद 9. अनुविंद* *10. दुर्धर्ष 11. सुबाहु। 12. दुषप्रधर्षण* *13. दुर्मर्षण। 14. दुर्मुख 15. दुष्कर्ण* *16. विकर्ण 17. शल 18. सत्वान* *19. सुलोचन 20. चित्र 21. उपचित्र* *22. चित्राक्ष 23. चारुचित्र 24. शरासन* *25. दुर्मद। 26. दुर्विगाह 27. विवित्सु* *28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ* *31. नन्द। 32. उपनन्द 33. चित्रबाण* *34. चित्रवर्मा 35. सुवर्मा 36. दुर्विमोचन* *37. अयोबाहु 38. महाबाहु 39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग 42. भीमबल* *43. बालाकि 44. बलवर्धन 45. उग्रायुध* *46. सुषेण 47. कुण्डधर 48. महोदर* *49. चित्रायुध 50. निषंगी 51. पाशी* *52. वृन्दारक 53. दृढ़वर्मा 54. दृढ़क्षत्र* *55. सोमकीर्ति 56. अनूदर 57. दढ़संघ 58. जरासंघ 59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक* *61. उग्रश्रवा 62. उग्रसेन 63. सेनानी* *64. दुष्पराजय 65. अपराजित* *66. कुण्डशायी 67. विशालाक्ष* *68. दुराधर 69. दृढ़हस्त 70. सुहस्त* *71. वातवेग 72. सुवर्च 73. आदित्यकेतु* *74. बह्वाशी 75. नागदत्त 76. उग्रशायी* *77. कवचि 78. क्रथन। 79. कुण्डी* *80. भीमविक्र 81. धनुर्धर 82. वीरबाहु* *83. अलोलुप 84. अभय 85. दृढ़कर्मा* *86. दृढ़रथाश्रय 87. अनाधृष्य* *88. कुण्डभेदी। 89. विरवि* *90. चित्रकुण्डल 91. प्रधम* *92. अमाप्रमाथि 93. दीर्घरोमा* *94. सुवीर्यवान 95. दीर्घबाहु* *96. सुजात। 97. कनकध्वज* *98. कुण्डाशी 99. विरज* *100. युयुत्सु* *( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,* *जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )* *"श्री मद्-भगवत गीता"के बारे में-* *ॐ . किसको किसने सुनाई?* *उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।* *ॐ . कब सुनाई?* *उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।* *ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?* *उ.- रविवार के दिन।* *ॐ. कोनसी तिथि को?* *उ.- एकादशी* *ॐ. कहा सुनाई?* *उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।* *ॐ. कितनी देर में सुनाई?* *उ.- लगभग 45 मिनट में* *ॐ. क्यू सुनाई?* *उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।* *ॐ. कितने अध्याय है?* *उ.- कुल 18 अध्याय* *ॐ. कितने श्लोक है?* *उ.- 700 श्लोक* *ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है?* *उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।* *ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा* *और किन किन लोगो ने सुना?* *उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने* *ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?* *उ.- भगवान सूर्यदेव को* *ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?* *उ.- उपनिषदों में* *ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?* *उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।* *ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?* *उ.- गीतोपनिषद* *ॐ. गीता का सार क्या है?* *उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना* *ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?* *उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574* *अर्जुन ने- 85* *धृतराष्ट्र ने- 1* *संजय ने- 40.* *अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे। धन्यवाद* *अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है।* *33 करोड नहीँ 33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू* *धर्म मेँ।* *कोटि = प्रकार।* *देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,* *कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।* *हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं...* *कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-* *12 प्रकार हैँ* *आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,* *शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,* *सविता, तवास्था, और विष्णु...!* *8 प्रकार हे :-* *वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।* *11 प्रकार है :-* *रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,* *अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,* *रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।* *एवँ* *दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।* *कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी* *अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है* *तो इस जानकारी को अधिक से अधिक* *लोगो तक पहुचाएं। ।* *
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सबसे पहले तो यह समझना चाहिए कि भारत का यह ज्योतिष विज्ञान कितना सदुपयोग करने लायक है आप यह जान लें कि हमारे ऋषि प्रभु पराशर वैदिक ज्योतिष का जो उन्होंने सूत्र दिए वह आज अचंभित करने वाले हैं किसी की जन्म पत्रिका को देखकर यह बताया जा सकता है कि वह किस क्षेत्र में तरक्की करेगा उसको लाभ होगा तो आप भी जानिए क्या आप राजनीति में आप भविष्य बना सकते हैं या आप सेना पुलिस में जाकर देश की सेवा कर सकते हैं या आप वरिष्ठ अधिकारी बनकर देश की सेवा कर सकते हैं या आपकी कुंडली में डॉक्टर बनने के योग हैं या आज के जमाने की तकनीकी कंप्यूटर इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में आप विशेष योग्यता हासिल करके इंजीनियर बन कर अपने भविष्य को संवार सकते हैं इस प्रकार के ग्रह योग आपकी जन्मकुंडली में है अगर आप जान जाते हैं आपके लिए अच्छा होगा तो हमारे यहां फ्यूचर स्टडी ऑनलाइन ऐप के अंदर बहुत सारे विद्वान आपको दिखाई दे रहे हैं इन सभी विद्वानों की नॉलेज वैदिक लाल किताब केपी एस्ट्रोलॉजी फॉर मिस्ट्री वास्तु न्यूमैरोलॉजी एवं पारंपरिक ज्योतिष ज्ञान के साथ आधुनिक समावेश में आपको भविष्य के लिए अच्छी राय मिल सकती है तो हमारे विद्वानों से बात करने के लिए बहुत ही सरल तरीका है अगर आप अनलिमिटेड कॉल पर क्लिक करते हैं तो आपको समय की कोई लिमिट नहीं है बात करने में अन्यथा आप पर मिनट कॉल का ऑप्शन प्रयोग कर सकते हैं और आप अपने लिए भविष्य के लिए अच्छी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं
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