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नाड़ी ज्योतिष की दृष्टि से व्यपार

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नाड़ी ज्योतिष की दृष्टि से व्यापार इस संसार में मुनष्य को जीविकोपार्जन के लिये कोई न कोई कार्य अवश्य करना होता है, जब तक वह धनार्जन नहीं करेगा, तब तक अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं करता सकता है। ज्योतिष में कर्म का कारक शनि होता है, शनि ही काल पुरूष की कुण्डली में कर्म का नैसर्गिक कारक होता है। शनि पर पड़ने वाले प्रभाव यह बताते हैं कि, जातक नौकरी करेगा या जातक की रूचि व्यापार की तरफ रहेगी। 1. व्यापार को देखने के लिये दशम भाव दशमेश, तृतीय भाव तृतीयेश, एकादश भाव एकादशेश, शनि, बुध, शुक्र, मिथुन, तुला, वृषभ राशियाँ देखी जाती हैं। 2. अब हम बुध पर विचार करते हैं, तो बुध व्यापार और लेन-देन का कारक होता है, बुध मोहिनी स्वरूप होता है, मोहिनी जिस प्रकार लोगों को आकर्षित करती है, उसी तरह व्यापार में भी आकर्षण की आवश्यकता होती है, मजबूत बुध के बिना सफल व्यापारी नहीं बना जा सकता है। बुध व्यवहार और प्रस्तुति का कारक होता है। एक अच्छे व्यापारी के लिये व्यवहार आकर्षक, प्रस्तुतिकरण रोचक होना आवश्यक होता है। बुध प्रयोग का कारक होता है, सफल व्यापारी हमेशा प्रयोगधर्मी होते हैं, वह यथार्थ सत्य के धरातल पर भरोसा रखने वाले होते हैं। बुध पार्टनर, लेखा-जोखा, एजेन्सी, कमीशन का कारक होता है, इसलिये एक सफल व्यापारी के लिये बुध का बलवान होना आवश्यक होता है। 3. अब शुक्र पर विचार करते हैं, शुक्र व्यापार से सीधे तौर से सम्बन्धित नहीं होता है, किन्तु जहां व्यापार होता है, वहां धन होता है। अनुभव में यह देखा गया है कि, बुध, शुक्र हमेशा पास होते हैं। बलवान शुक्र के बिना अच्छा धन नहीं कमाया जा सकता है। काल पुरूष की कुण्डली में शुक्र नैसर्गिक सप्तमेश का कारक होता है। सप्तम भाव व्यापार का कर्म क्षेत्र होता है। सप्तम भाव से बाहर का आने वाला धन देखा जाता है, जबकि द्वितीय भाव से संग्रह करने वाला धन देखा जाता है। शुक्र नकदी, लेन-देन, फाइनेन्स का कारक होता है। सप्तम भाव से दैनिक रोजगार देखते हैं, दैनिक रोजगार से जो धन आता है, उसका कारक शुक्र ही होता है। शुक्र आकर्षण, सुन्दरता का कारक होता है यद्यपि बुध प्रस्तुतिकरण देता है, किन्तु शुक्र किसी वस्तु को सुन्दर बनाता है, व्यापार में अक्सर व्यापारी वस्तु को आकर्षक बनाते हैं, जिससे अधिक से अधिक ग्राहक आकर्षित हो सकें। उच्च स्तरीय व्यापारी बनने के लिये शुक्र का विस्तारवादी ग्रहों से सम्बन्ध होना आवश्यक होता है, जब भी शुक्र का राहु के साथ सम्बन्ध बनता है, तब व्यापार और धन में अधिक वृद्धि होती है, जब बुध, शुक्र, राहु का कर्म कारक शनि के साथ सम्बन्ध बनेगा, तो जातक बहुत बड़ा व्यापारी होगा। अर्थ त्रिकोण और काम त्रिकोण के स्वामी बुध, शुक्र, शनि जब एक साथ विस्तारवादी ग्रह राहु के साथ सम्बन्ध बनाते हैं, तो धन का महाप्रताप योग बनता है, ऐसे जातक उच्च स्तरीय व्यापारी होते हैं। बड़े-बड़े उद्योगपतियों की कुण्डली में भी धन का महाप्रताप योग बनता है। जैसे मुकेश अंबानी। नोट- शनि का सम्बन्ध जब बुध, शुक्र से हो, विस्तारवादी ग्रह राहु और गुरू से हो, सप्तम, तृतीय, एकादश, द्वितीय भाव के स्वामियों के साथ हो, तो जातक व्यापारी होगा। जातक की रूचि व्यापार में होगी। ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

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नाड़ी ज्योतिष
posted Jan 31 by anonymous

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ज्योतिष शास्त्र एक बहुत ही वृहद ज्ञान है। इसे सीखना आसान नहीं है। ज्योतिष शास्त्र को सीखने से पहले इस शास्त्र को समझना आवश्यक है। सामान्य भाषा में कहें तो ज्योतिष माने वह विद्या या शास्त्र जिसके द्वारा आकाश स्थित ग्रहों, नक्षत्रों आदि की गति, परिमाप, दूरी इत्या‍दि का निश्चय किया जाता है। ज्योतिष वास्तव में संभावनाओं का शास्त्र है। सारावली के अनुसार इस शास्त्र का सही ज्ञान मनुष्य के धन अर्जित करने में बड़ा सहायक होता है क्योंकि ज्योतिष जब शुभ समय बताता है तो किसी भी कार्य में हाथ डालने पर सफलता की प्राप्ति होती है इसके विपरीत स्थिति होने पर व्यक्ति उस कार्य में हाथ नहीं डालता। ज्योतिष ऐसा दिलचस्प विज्ञान है, जो जीवन की अनजान राहों में मित्रों और शुभचिन्तकों की श्रृंखला खड़ी कर देता है। इतना ही नहीं इसके अध्ययन से व्यक्ति को धन, यश व प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। इस शास्त्र के अध्ययन से शूद्र व्यक्ति भी परम पूजनीय पद को प्राप्त कर जाता है।  ज्योतिष सूचना व संभावनाओं का शास्त्र है। ज्योतिष गणना के अनुसार अष्टमी व पूर्णिमा को समुद्र में ज्वार-भाटे का समय निश्चित किया जाता है। वैज्ञानिक चन्द्र तिथियों व नक्षत्रों का प्रयोग अब कृषि में करने लगे हैं। ज्योतिष शास्त्र भविष्य में होने वाली दुर्घटनाओं व कठिनाइयों के प्रति मनुष्य को सावधान कर देता है। रोग निदान में भी ज्योतिष का बड़ा योगदान है।  दैनिक जीवन में हम देखते हैं कि जहां बड़े-बड़े चिकित्सक असफल हो जाते हैं, डॉक्टर थककर बीमारी व मरीज से निराश हो जाते हैं वही मन्त्र-आशीर्वाद, प्रार्थनाएँ, टोटके व अनुष्ठान काम कर जाते हैं।
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इससे पहले कि ज्योतिष की भविष्यवाणी की जाए, ज्योतिष और खगोल विज्ञान, दोनों विज्ञानों का अध्ययन किया जाना चाहिए। खगोल विज्ञान हमें हमारे सौर मंडल में विभिन्न ग्रहों की स्थिति के बारे में बताता है। सौर मंडल के संदर्भ का अर्थ है कि सूर्य केंद्र में है और नौ ग्रह उसके चारों ओर घूमते हैं

यह ग्रह हैं बुध, शुक्र, मंगल, पृथ्वी, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो हैं। प्रत्येक ग्रह की गति अलग-अलग होती है इसलिए प्रत्येक ग्रह को वर्ष या वर्षों के दौरान सूर्य की परिक्रमा पूरी करने में अलग-अलग समय लगता है।

पेहले 6 ग्रह विरोधी घड़ी वार दिशा में घूमते हैं। भारतीय ज्योतिष में चंद्रमा भी एक ऐसा ग्रह है जहां वास्तव में यह पृथ्वी का उपग्रह है। सूर्य लगभग 14.96 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर पृथ्वी का सबसे निकट का तारा है। यह व्यास में पृथ्वी से 109.3 गुना अधिक है।

 

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ज्योतिष एक विज्ञान है न की अन्धविश्वाश।हमे अन्धविश्वाश नही करना चाहिए ज्योतिष विज्ञान है।हर चीज़ का एक निर्धारित फार्मूला होता है।आज मैं दीक्षा राठी केमद्रुम दोष जो की प्रायः हर 100 में 1 कुंडली में पाया जाता है और जिसके बारे में कई गलत सही धारणाएं बनी हुई है। केमद्रुम योग में जन्‍म लेनेवाला व्‍यक्ति निर्धनता एवं दुख को भोगता है. आर्थिक दृष्टि से वह गरीब होता है. आजिविका संबंधी कार्यों के लिए परेशान रह सकता है. मन में भटकाव एवं असंतुष्टी की स्थिति बनी रहती है. व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर निर्भर रह सकता है. पारिवारिक सुख में कमी और संतान द्वारा कष्‍ट प्राप्‍त कर सकता है. ऐसे व्‍यक्ति दीर्घायु होते हैं।कुंडली के द्वारा उचित उपाय से समाधान संभव होता है। केमद्रुम योग के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह योग संघर्ष और अभाव ग्रस्त जीवन देता है. इसीलिए ज्योतिष के अनेक विद्वान इसे दुर्भाग्य का सूचक कहते हें. परंतु लेकिन यह अवधारणा पूर्णतः सत्य नहीं है. केमद्रुम योग से युक्त कुंडली के जातक कार्यक्षेत्र में सफलता के साथ-साथ यश और प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं. वस्तुतः अधिकांश विद्वान इसके नकारात्मक पक्ष पर ही अधिक प्रकाश डालते हैं. यदि इसके सकारात्मक पक्ष का विस्तार पूर्वक विवेचन करें तो हम पाएंगे कि कुछ विशेष योगों की उपस्थिति से केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में परिवर्तित हो जाता है. इसलिए किसी जातक की कुंडली देखते समय केमद्रुम योग की उपस्थिति होने पर उसको भंग करने वाले योगों पर ध्यान देना आवश्यक है तत्पश्चात ही फलकथन करना चाहिए।ज्योतिष का अधूरा ज्ञान बहुत हानिकारक होता है।इसलिए योग्य ज्योतिष द्वारा परामर्श के बाद उपाय करना चाहिए। केमद्रुम योग का भंग होना जब कुण्डली में लग्न से केन्द्र में चन्द्रमा या कोई ग्रह हो तो केमद्रुम योग भंग माना जाता है. योग भंग होने पर केमद्रुम योग के अशुभ फल भी समाप्त होते है. कुण्डली में बन रही कुछ अन्य स्थितियां भी इस योग को भंग करती है, जैसे चंद्रमा सभी ग्रहों से दृष्ट हो या चंद्रमा शुभ स्‍थान में हो या चंद्रमा शुभ ग्रहों से युक्‍त हो या पूर्ण चंद्रमा लग्‍न में हो या चंद्रमा दसवें भाव में उच्‍च का हो या केन्‍द्र में चंद्रमा पूर्ण बली हो अथवा कुण्डली में सुनफा, अनफा या दुरुधरा योग बन रहा हो, तो केमद्रुम योग भंग हो जाता है. यदि चन्द्रमा से केन्द्र में कोई ग्रह हो तब भी यह अशुभ योग भंग हो जाता है और व्यक्ति इस योग के प्रभावों से मुक्त हो जाता है. कुछ अन्य शास्त्रों के अनुसार- यदि चन्द्रमा के आगे-पीछे केन्द्र और नवांश में भी इसी प्रकार की ग्रह स्थिति बन रही हो तब भी यह योग भंग माना जाता है. केमद्रुम योग होने पर भी जब चन्द्रमा शुभ ग्रह की राशि में हो तो योग भंग हो जाता है. शुभ ग्रहों में बुध्, गुरु और शुक्र माने गये है. ऎसे में व्यक्ति संतान और धन से युक्त बनता है तथा उसे जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है। दीक्षा राठी
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किसी भी जातक की जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव घर, वाहन, माता व सुख भाव होता है। इसी भाव से अचल संपत्ति, भौतिक सुख-सुविधा, तालाब, बावड़ी व घर का वातावरण जान सकते हैं। इस भाव में विभिन्न प्रकार के सुख को जानिए ग्रह की उपस्थिति और उनकी दृष्टि से। 1. चतुर्थ भाव में यदि बुध स्थित है और इसी भाव में शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही है तो राजयोगी योग बनता है। ऐसे जातक के घर में अनेक नौकर-चाकर रहते हैं। साधन-संपन्न होकर तमाम सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने वाला होता है। 2. चतुर्थ भाव में कारक ग्रह चंद्रमा यदि विराजमान है और यदि वह उच्च का या स्वराशि पर स्थित है तथा उच्च ग्रहों की दृष्टि इस भाव पर पड़ रही है तो जातक को सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं। उसका जीवन आनंदमय व्यतीत होता है। 3. इस भाव में सूर्य शुभ नहीं माना गया है। नीच का सूर्य जातक को धनहीन, भूमिहीन बना देता है। इसके कारण बार-बार स्थान परिवर्तन भी होता है। सिंह का सूर्य इस भाव में शुभ होता है। किसी भी जातक की जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव घर, वाहन, माता व सुख भाव होता है। इसी भाव से अचल संपत्ति, भौतिक सुख-सुविधा, तालाब, बावड़ी व घर का वातावरण जान सकते हैं। इस भाव में विभिन्न प्रकार के सुख को जानिए ग्रह की उपस्थिति और उनकी दृष्टि से। 4. चतुर्थ भाव में चंद्रमा स्थित होने पर और शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ने पर साथ में शुक्र पर चंद्रमा की दृष्टि पड़ने पर जातक के पास अनेक वाहन होते हैं। 5. चतुर्थ भाव में यदि राहु-केतु विराजमान हैं तो जातक को धार्मिक प्रवृत्ति वाला बना देते हैं। ये चतुर्थ भाव में मौन रहते हैं। 6. शनि का चतुर्थ भाव जातक को वृद्धावस्था में चिड़चिड़ा, एकांतप्रिय या संन्यासी बना सकता है। नीच का शनि भिखारी जैसी हालत कर सकता है। 7. चतुर्थ भाव का शुक्र और शुभ ग्रहों की दृष्टि जातक को भौतिक सुख प्रदान करती है। कभी-कभी ऐसे जातक का भाग्य उसके विवाह करने के बाद उदय होता है। 8. चतुर्थ भाव में मंगल जातक को अपराधी प्रवृत्ति का बना देता है और सबकुछ तबाह कर देता है। जिन जातकों की कुंडली में यह स्थिति हो उन जातकों को इसकी शांति अवश्य कराना चाहिए। 9. चतुर्थ भाव में उच्च का बृहस्पति होना और यदि शुभ ग्रहों की दृष्टि उस पर पड़ रही है तो जातक को राज्य से धन प्राप्ति का योग बनता है। इसके फलस्वरूप वह उच्च पद भी पा सकता है। नीच का गुरु परिवार और भाई से द्वेष या दुश्मनी करा सकता है।
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तिल का ज्योतिष से संबंध 〰️〰️
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