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लक्ष्मी प्राप्ति योग

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*प्रत्येक मनुष्य चाहे वह किसी भी समुदाय से संबंधित क्यों ना हो उसे लक्ष्मी की प्राप्ति और उसके महत्व को हमेशा स्वीकार करना पड़ता है इसीलिए शास्त्रों में बताया गया है व्यक्ति को श्री संपन्न होना चाहिए। जो लोग व्यापार करते हैं और अपनी ओर से वे संपूर्ण प्रयास करते हैं कि धन संचय हो किंतु आय के पर्याप्त स्त्रोत नहीं बन पाते हैं जिसके कारण उन्हें काफी आर्थिक कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है। व्यक्ति ऊपर उठने के लिए दिन-रात अथक परिश्रम करते हैं खून पसीना एक कर देते हैं उसके बाद भी उन्हें वह कुछ नहीं मिल पाता है । हर व्यक्ति अपने जीवन में अष्टलक्ष्मी को प्राप्त करना चाहता है जब लक्ष्मी को संपूर्णता से अपने जीवन में समाहित करने की बात आती है तभी हम अष्टलक्ष्मी के महत्व को स्वीकार कर पाते हैं अष्टलक्ष्मी में ही आठ प्रकार के ऐश्वर्य छुपे होते हैं जैसे धन लक्ष्मी यस लक्ष्मी आयु लक्ष्मी वाहन लक्ष्मी स्थिर लक्ष्मी गृह लक्ष्मी संतान लक्ष्मी भवन लक्ष्मी आदि। तंत्र के विशिष्ट ग्रंथों में लक्ष्मी को प्रसन्न करने के विशेष उपाय दिए गए विशेष साधना में कमला साधना भी कहीं गई रुद्रयामल और किड्डीस तंत्र मे मुखर रूप से कहा गया है व्यक्ति चाहे तो जन्म जन्मांतर की गरीबी को भी साधना के द्वारा दूर कर सकता है। अब हमको लक्ष्मी को कैसे मनाना है बहुत से लोग कनकधारा स्त्रोत्र श्री सूक्तम कमला स्त्रोत्र आदि के पाठ करने की सलाह देते हैं। वास्तव में यदि लक्ष्मी को प्रसन्न करना है तो उसके लिए साधक में पात्रता होनी चाहिए जैसे गंदे कपड़े नहीं पहनने चाहिए सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सोना नहीं चाहिए। लक्ष्मी की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम उनके दत्तक पुत्र को या भांजे को प्रसन्न करना होगा उसके बाद भगवती लक्ष्मी प्रसन्न होगी। इसलिए हमें गणेश भगवान की की कृपा प्राप्त करनी होगी तत्पश्चात माता की आराधना करनी पड़ेगी। मैं आज आपको एक विशिष्ट तांत्रिक मंत्र दे रहा हूं जिसका आप नित्य नियम पूर्वक जब करें लाभ अवश्य होगा नुकसान नहीं होगा । यह प्रयोग एक हिमालय साधक से मुझे मिला था अनुभूत प्रयोग है आप लोग भी लाभ उठाएं इस प्रयोग का विशेष लाभ अक्षय तृतीया के दिन जप करने से मिलता है। ललाट में लाल सिंदूर का तिलक करें उत्तर की ओर मुख करें लाल आसन में बैठ जाएं लाल धोती धारण करें सादगी के दीपक जलाएं तत्पश्चात भाग्योदय लक्ष्मी का जप करें "ओम लक्ष्मी आबद्ध आबद्ध सिद्धय सिद्धय फट्" इस मंत्र का जप केवल 51 माला ही करना है। आप चाहे 1 दिन में कर ले या 1 सप्ताह कर ले लाभ होगा।*

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लक्ष्मी प्राप्ति योग
posted Feb 10 by anonymous

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आकस्मिक धन प्राप्ति के योग आकस्मिक धन प्राप्ति से आशय हैं कि इनाम, भेंट, वसीहत, रेस- लॉटरी, भू – गर्भ धन, स्कॉलरशिप आदि से प्राप्त धन का निर्देश मिलता हैं । जब कि अष्टम भाव गुप्त भू-गर्भ, वसीहत, अनसोचा या अकल्पित धन दर्शाता हैं । धन संपत्ति प्रारब्ध में होती है, तब ही मनुष्य उसे प्राप्त कर सकता हैं । भाग्यशाली लोगों को ही बिना परिश्रम के अचानक धन प्राप्त होता हैं, इसलिए कुण्डली में नवम भाव त्रिकोण का भी विशेष महत्व हैं । इस तरह अचानक आकस्मिक धन – संपत्ति प्राप्ति के लिये कुंडली में द्वितीय धनभाव, एकादश लाभभाव, पंचम प्रारब्ध एवं लक्षमीभाव, अष्टम गुप्त धनभाव तथा नवम भाग्य भाव एवं इसके अधिपति तथा इन भावों में स्थित ग्रहों के बलाबल के आधार पर संभव हैं । अब हम आपको निम्न योग बताएँगे जिसके अनुसार आकस्मिक धन प्राप्ति का योग संभव होता हैं। 1.धनेश अष्टम भाव में अष्टमेश धन भाव में अकस्मात धन दिलाता हैं । 2.लग्नेश धनभाव में तथा धनेश लग्न भाव में भी अचानक धन दिलाता हैं । 3.द्वितीय भाव का अधिपति लग्न स्थान में और लग्नेश द्वितीय भाव में होता हैं तो भी अकस्मात धन लाभ कराता हैँ। 4.लाभ भाव में चन्द्रमा + मंगल की युति व बुध भाव में स्थित होने पर भी अकस्मात धन लाभ होता हैं। 5.अष्टम भाव में शुक्र तथा चंद्र + मंगल कुंडली के किसी भी भाव में एक साथ होते हैं तो अक्समात धन लाभ होता हैं। 6.भाग्यकारक गुरु अगर नवमेश होकर अष्टम भाव में हैं तो जातक अकस्मात धनी बनता हैं। 7.द्वितीय एवं पंचम स्थान के स्वामी की युति या दृष्टि सम्बन्ध या स्थान परिवर्तन योग बनता हैं तो लॉटरी लगती हैं। 8.कुंडली में धनभाव, पंचम भाव, एकादश भाव, नवम भाव का किसी भी प्रकार से सम्बन्ध हिट हैं तो अकस्मात धन प्राप्त करता हैं। 9.पंचम, एकादश या नवम भाव में राहु केतु होते हैं तो लॉटरी खुलती हैं, क्योंकि राहु अकल्पित धन देता हैं । 10.षष्टम- अष्टम, अष्टम-नवम, एकादश- द्वादश स्थान के परिवर्तन योग आकस्मिक धन प्राप्ति कराते हैँ । इनके दशा अन्तर्दशा में ऐसा होता हैं। 11.अष्टम भाव स्थित धनेश जातक को जीवन में दबा हुआ, गुप्त धन, वसीहत से धन प्राप्त कराता हैं । 12.लग्नेश धनेश के सम्बन्ध से पैतृक संपत्ति मिलती हैँ। 13.लग्नेश चतुर्थेश के सम्बन्ध से माता से धन प्राप्त होता हैं। 14.लग्नेश शुभ ग्रह होकर अगर धन भाव में स्थित हो तो जातक को खज़ाना प्राप्त कराता हैं। 15.अष्टम स्थान स्थित लाभेश मतलब एकादशेश अचानक धन दिलाता हैं। 16.कर्क या धनु राशि का गुरु अगर नवम भाव में स्थित होता हैं, और मकर का मंगल यदि कुंडली में चन्द्रमा के स्थान दशम भाव में होता हैँ तो अकस्मात धन दिलाता हैं । 17.चंद्र-मंगल, पंचम भाव में हो और शुक्र की पंचम भाव पर दृष्टि होती हैँ तो जातक अचानक धन पाता हैं । 18.चंद्र-गुरु की युति कर्क राशि में द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम या एकादश भाव में से किसी भी भाव में होती हैं तो जातक अकस्मात धन पाता हैं । चंद्र से तृतीय, पंचम, दशम एवं एकादश भाव में शुभ ग्रह धन योग की रचना करते हैं।
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वैदिक ज्योतिष के अनुसार अंगारक योग का निर्माण किसी भी कुंडली में उस स्थिति में होता है, जब एक ही भाव में मंगल ग्रह के साथ राहु अथवा केतु उपस्थित हों। इसके अलावा, यदि मंगल का दृष्टि सम्बन्ध भी राहु अथवा केतु से हो रहा हो तो भी इस योग का निर्माण हो सकता है। आमतौर पर अंगारक योग को एक बुरा और अशुभ योग माना जाता है और इससे जीवन में समस्याओं की बढ़ोतरी होती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अंगारक दोष बुरे योगों में सम्मिलित किया गया है। अंगारक की प्रकृति से समझें तो अंगारे जैसा फल देने वाला योग बनता है। यह जिस भी भाव में बनता है, उस भाव के कारकत्वों को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इस योग के प्रभाव से व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन आते हैं, और उसमें गुस्से की अधिकता हो सकती है। यह योग व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है और वह अपने क्रोध तथा दुर्घटना आदि के कारण समस्याओं को निमंत्रण देता है। मंगल को भाई का कारक कहा जाता है, इसलिए इस योग के प्रभाव से कई बार व्यक्ति की अपने भाइयों से नहीं बनती तथा दुर्घटना होने की संभावना रहती है। इस प्रकार के योग वाले व्यक्तियों पर शत्रुओं का प्रभाव भी अधिक पड़ता है और वे मानसिक तनाव में बने रहते हैं। किसी योग्य विद्वान से अंगारक योग निवारण पूजा कराना सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इससे ग्रह शांत हो जाते हैं और उनके नकारात्मक प्रभाव कम हो जाते हैं। मंगल राहु अंगारक योग अथवा मंगल केतु अंगारक योग उपाय के रूप में इन ग्रहों की शांति मंत्र जाप तथा हवन द्वारा कराना भी उत्तम परिणाम देता है। -मंगल केतु अंगारक योग उपाय के रूप में मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में लाल रंग का झंडा लगाना चाहिये। -अंगारक योग निवारण के लिए माता महालक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए और यह पूजा तब करनी चाहिए, जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में स्थित हो। -मंगलवार के दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय की आराधना करने से भी अंगारक दोष से मुक्ति मिलती है। -अंगारक योग निवारण के लिए आप बजरंग बाण का नियमित पाठ कर सकते हैं और हनुमान जी को चोला चढ़ा सकते हैं। -यदि मंगल और राहु दोनों ही अशुभ परिणाम दे रहे हों तो मंगल और राहु का दान करना चाहिए। -अपने शरीर पर चाँदी धारण करें क्योंकि इससे इन दोनों ही ग्रहों को शांत करने में मदद मिलती है। -समय-समय पर अपने भाइयों की मदद करें और अपने ससुराल पक्ष से अपने संबंध सुधारें। -राह के कुत्तों को मीठी रोटी खिलानी चाहिए। -अंगारक योग का उपाय यह भी है कि आप अपने दाहिने हाथ में तांबे का कंगन पहनें और ॐ अं अंगारकाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें। -आप रात को सोते समय अपने सिरहाने या तकिए के निकट तांबे के जग अथवा लोटे में पानी भर कर रखें और सुबह किसी काँटे वाले पौधे या कैक्टस में इस पानी को डाल दें। -अनामिका उंगली में मंगलवार के दिन तांबे की अंगूठी पहनना भी अच्छा परिणाम देता है।
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कुंडली में शुभ ग्रहों की स्थिति, युति या दृष्टि से राज योग का निर्माण होता है। कुंडली में मौजूद राज योग से आपके जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाती हैं। कुंडली में राज योग के होने से सकारात्मकता की भावना आपके अंदर आती है, राज योग के समय काल को जानकर आप इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा सकते हैं। जरूरी कदम उठाकर आप अपने स्वर्णिम काल के दौरान अपने जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते हैं। आपकी कुंडली में राज योग कुंडली में केंद्र (1, 4, 7, 10) और त्रिकोण (5, 9) भावों के बीच संबंध से राज योग का निर्माण होता है। इन भावों के स्वामियों के बीच जितना मजबूत संबंध होता है, उतना ही शक्तिशाली राज योग बनता है। लग्न को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है यह केंद्र के साथ-साथ यह त्रिकोण भाव भी माना जाता है। नीचे दी गई परिस्थितियों में जातक की कुंडली में राज योग का निर्माण होता है। जब केंद्र और त्रिकोण भाव के स्वामी एक दूसरे के साथ एक ही घर में होते हैं तो राज योग का निर्माण होता है। जब केंद्र और त्रिकोण भावों के स्वामी एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं तो कुंडली में राज योग बनता है। जब केंद्र और त्रिकोण भावों के स्वामी ग्रह परस्पर परिवर्तन योग में हैं तो बहुत मजबूत राज योग का निर्माण होता है। उदाहरण के लिये, वृषभ लग्न का स्वामी शुक्र नवम भाव में विराजमान है, जोकि एक त्रिकोण भाव है और इस भाव का स्वामी शनि लग्न में विराजमान है तो, यह बहुत शक्तिशाली राज योग बनता है। कुंडली में ग्रहों के परिवर्तन से ग्रहों के बीच शक्तिशाली संयोजन बनता है इसलिये यह राज योग बहुत शक्तिशाली होता है। ग्रहों की दृष्टि से सबसे मजबूत राज योग बनता है और उसके बाद ग्रहों की युति से। जितने शुभ ग्रहों का संयोजन एक कुंडली में होगा उतना शक्तिशाली राज योग बनेगा। अगर शुभ ग्रहों पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि पड़ रही है तो राज योग की शक्ति कम हो जाती है। अगर किसी की कुंडली में एक से ज्यादा ऐसे संयोग बन रहे हैं जिनसे राज योग का निर्माण होता है तो यह बहुत शुभ माना जाता है। यदि किसी की जन्म कुंडली में सूर्य और बुध दशम भाव में हैं और राहु और मंगल षष्ठम भाव में हैं तो राज योग बनता है। इस राज योग के चलते व्यक्ति को समाज में बहुत मान-सम्मान प्राप्त होता है। जब चतुर्थ, पंचम, नवम और दशम भाव में कोई भी पाप ग्रह विराजमान नहीं होता तो, कुंडली में एक मजबूत राज योग का निर्माण होता है। बृहस्पति की चंद्रमा या मंगल से यदि युति हो रही है तो राज योग का निर्माण होता है। जब चतुर्थ, पंचम और सप्तम भाव के स्वामी केंद्र या लग्न में युति करते हैं तो इसे एक शुभ राज योग माना जाता है। यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न, पंचम और नवम भाव के स्वामी ग्रह एक दूसरे के घरों में विराजमान हों तो ऐसे में राज योग का निर्माण होता है और ऐसा व्यक्ति राजा की जैसी जिंदगी जीता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली के एकादश भाव में बहुत सारे शुभ ग्रह विराजमान हों तो ऐसे में राज योग का निर्माण होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में सुख-सुविधाएं पाता है। जिस जातक की कुंडली में त्रिकोण के ग्रह अपने घर में हों या उच्च के हों तो यह स्थिति भी राज योग कहलाती है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक प्रकृति का होता है और जीवन में काफी धन कमाता है। जिस जातक की कुंडली में त्रिकोण के ग्रह अपने घर में हों या उच्च के हों तो यह स्थिति भी राज योग कहलाती है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक प्रकृति का होता है और जीवन में काफी धन कमाता है। बृहस्पति ग्रह यदि लग्न में चंद्रमा के साथ युति बना रहा हौ और कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत हो तो ऐसा व्यक्ति राजनीति के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करता है।
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*ज्योतिष में कुछ महत्वपूर्ण योग विचार* : #रवि_योग : जन्म कुण्डली में निम्न ग्रह योग रवि योग बनाते हैं : * #वेषी_योग : सूर्य से द्वितीय भाव में चन्द्रमा के इलावा कोई भी ग्रह हो तो यह योग बनता है , ऐसा जातक कम भौतिक सुख के होते हुए भी प्रसन्न चित रहते हुए खुशी से रहता है । * #वोशी_योग : सूर्य से द्वादश भाव में चन्द्रमा के इलावा कोई भी ग्रह हो तो यह योग बनता है, ऐसा जातक अच्छा विद्यार्थी, दान - पुण्य करने वाला, किसी ना किसी गुण और कला के चलते प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है । * #उभाचार्य_योग : सूर्य से द्वितीय और द्वादश भावो में चन्द्रमा के इलावा अन्य ग्रह हो तो यह योग बनता है, ऐसा जातक सभी तरह के भौतिक सुख सुविधाओं को भोगने वाला होता है । * #बुधादित्य_योग : सूर्य और बुध एक ही राशि में होने पर यह योग बनता है, ऐसा जातक अपने कार्यो में निपुण होता है , और बेहतर कार्यो की वजह से समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है , यह योग दशमांश कुण्डली में बन रहा हो तो बेहतर फल देता है । #चन्द्र_योग : जन्म कुण्डली में निम्न ग्रह योग चन्द्र योग बनाते हैं : * #सुफ़ना_योग : चन्द्रमा से द्वितीय भाव में सूर्य के इलावा कोई भी ग्रह हो तो यह योग होता है , ऐसा जातक अच्छी सोच समझ रखने वाला, सम्मानित , खुद से धनार्जन करने वाला होता है । * #अफना_योग : चन्द्रमा से द्वादश भाव में सूर्य के इलावा कोई भी ग्रह हो तो यह योग होता है, ऐसा जातक उच्च अधिकारी , रोग से रहित, भौतिक सुख भोगने वाला होता है । * #दुर्धरा_योग : चन्द्रमा से द्वितीय एवं द्वादश भावो में सूर्य के इलावा कोई भी ग्रह हो तो यह योग होता है, ऐसा जातक धनी, दान पुण्य करने वाला, सभी तरह के भौतिक सुख प्राप्त करने वाला होता है । * #केमद्रुम_योग : चन्द्रमा से युति कोई ग्रह ना करे और ना ही द्वितीय एवं द्वादश भावो में कोई ग्रह हो तो यह योग होता है , ऐसा जातक दुर्भाग्य , दरिद्र , असफलता से परेशान होता है । * #चंद्र_मंगल_योग : चंद्र मंगल युति होने पर यह योग होता है, ऐसा जातक भौतिक सुखों को प्राप्त करता है, धनी होता है लेकिन माता से कष्ट प्राप्त करता है । * #आदि_योग : चन्द्रमा से 6, 7, 8वे भाव में नैसर्गिक शुभ ग्रह होने पर यह योग बनता है, ऐसा जातक साहसी, जोखिम भरे कार्य करके सफलता प्राप्त करने वाला होता है । #महापुरुष_योग : ज्योतिष अनुसार निम्न 5 ग्रहों से बनने वाले योग को महापुरुष योग कहा जाता है : * #रूचक_योग : जन्म लग्न कुण्डली के केंद्र भाव ( 1, 4, 7, 10 ) में मंगल अपनी या उच्च राशि में हो तो यह योग होता है, ऐसा जातक विद्वान लोगो की संगत करने वाला, जोखिम भरे कार्य में भी सफल होने वाला, शत्रु पर विजय प्राप्त करने वाला , भाई एवं मित्रों से सुख प्राप्त करने वाला होता है । * #भद्र_योग : जन्म लग्न कुण्डली के केंद्र भाव ( 1, 4, 7, 10 ) में बुध अपनी या उच्च राशि में हो तो यह योग होता है, ऐसा जातक सगे संबंधी एवं मित्रों से सुख प्राप्त करने वाला, वाणी से दुसरों को प्रभावित करने वाला, धार्मिक एवं धनी होता है । * #शश_योग : जन्म लग्न कुण्डली के केंद्र भाव ( 1, 4, 7, 10 ) में शनि अपनी या उच्च राशि में हो तो यह योग होता है, ऐसा जातक दान पुण्य एवं परूपकार करते हुए सुख प्राप्त करने वाला, समाज भलाई के कार्य करने वाला, प्रकृति से प्रेम करने वाला, तकनीकी विषयो की शिक्षा प्राप्त करके सफल होता है । * #मालव्य_योग : जन्म लग्न कुण्डली के केंद्र भाव ( 1, 4, 7, 10 ) में शुक्र अपनी या उच्च राशि में हो तो यह योग होता है, ऐसा जातक कला में निपुण, भौतिक सुख भोगने वाला, अच्छे अच्छे वस्त्र एवं भोजन का भोग करने वाला होता है । * #हंस_योग : जन्म लग्न कुण्डली के केंद्र भाव ( 1, 4, 7, 10 ) में गुरु अपनी या उच्च राशि में हो तो यह योग होता है, ऐसा जातक समाज में सम्मानित, कार्यो में निपुण, विद्वान एवं धार्मिक होता है । #राज_योग : जन्म कुण्डली में निम्न ग्रह योग होने पर जातक राजा के समान सुख भोगता है : * लग्नेश एवं पंचमेश की युति साथ ही पुत्र कारक एवं आत्म कारक ग्रहो की युति हो तो राजयोग होता है , ऐसा जातक संतान प्राप्ति के बाद से तरक्की करता है , राजा एवं मंत्री पद को प्राप्त होता है राजसिक सुख भोगता है । * आत्म कारक ग्रह एवं भाग्येश की युति हो इन पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो भी राजयोग होता है । * द्वितीयेश, सुखेश , पंचमेश एवं आत्म कारक ग्रह शुभ ग्रह की राशि में हो तो राजयोग होता है । * त्रितयेश, षष्ठेश एवं आत्म कारक ग्रह अशुभ ग्रह की राशि में हो तो राजयोग होता है । * घटी लग्न एवं होरा लग्न का एक ही ग्रह के द्वारा दृष्ट होना राजयोग देता है । * घटी लग्न एवं होरा लग्न के स्वामी ग्रह अपनी / उच्च राशि में हो तो राजयोग होता है । * पंचमेश एवं भाग्येश की युति हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो राजयोग देती है । * दशमेश चतुर्थ में , चतुर्थ का स्वामी ग्रह दसम भाव में हो , साथ में पंचमेश / भाग्येश से दृष्ट हो तो राजयोग होता है । * जन्म कुण्डली में 4 ग्रह उच्च या अपनी राशि में हो तो जातक राजा के समान सुख भोगता है । * जन्म कुण्डली के केंद्र भाव में शुभ ग्रह हो और 3, 6, 11वे भाव में अशुभ ग्रह हो तो भी राजयोग होता है । * पंचमेश 1, 4, 10वे भाव में हो एवं लग्नेश , भाग्येश से युति करे तो भी राजयोग होता है । * जन्म कुण्डली में चन्द्रमा बलि हो एवं वर्गोत्तम हो तो भी राजयोग होता है । #धन_योग : जन्म कुण्डली में निम्न ग्रह योग होने पर जातक धन संपदा के सुख भोगता है : * द्वितीयेश एवं लाभेश में राशि परिवर्तन योग होने पर धन योग होता है । * द्वितीयेश का संबंध 4 / 5 / 7/ 9 / 10वे भाव के स्वामी ग्रह से बने तो पारिवारिक धन संपदा से धनी होता है । * एकादश के स्वामी ग्रह का संबंध 4 / 5 / 7 / 9 / 10वे भाव के स्वामी ग्रह से बने तो खुद की आय से धनी होता है । * पंचमेश / भाग्येश के द्वितीय एवं एकादश भाव में होने पर धन योग होता है । * चतुर्थ / सप्तम / दसम के स्वामी ग्रह का द्वितीय एवं एकादश भाव में होने पर धन योग होता है । * चन्द्र / गुरु / शुक्र शुभ राशि के होकर द्वितीय एवं एकादश भावों से संबंधित हो तो भी धन योग होता है । #दरिद्र_योग : जन्म कुण्डली में निम्न ग्रह योग होने पर जातक गरीबी एवं दरिद्रता से पीड़ित होता है * लग्नेश का 6 / 8 / 12वे भाव में होकर मारक ग्रहो से संबंधित होना । * द्वितीयेश का 12वे भाव में पापी / मारक ग्रहों के बीच होना । * लग्नेश / सूर्य / चन्द्रमा का संबंध पापी / मारक ग्रहो से होना । * पंचमेश / भाग्येश का 6 / 8 / 12वे भाव में होकर मारक ग्रहो से संबंधित होना । * द्वितीय, चतुर्थ एवं एकादश भावों को नैसर्गिक अशुभ ( शनि, मंगल, राहु ) ग्रहों द्वारा देखा जाना । * पंचमेश एवं सप्तमेश का 6 / 8/ 12वे भावों में होकर अशुभ ग्रहों से दृष्ट होना । * भाग्येश एवं दशमेश का 6 / 8 / 12वे भावों में होकर अशुभ ग्रहों से दृष्ट होना ।
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