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प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः। विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति॥ Low level men do not start any work due to fear of obstacles. Mediocres start a work but leave it in between due to disturbances. Bur, the men of excellence never leave a job unfinished after starting it whatever may be the problems. *निम्न श्रेणी के पुरुष विघ्नों के भय से किसी नये कार्य का आरंभ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के पुरुष कार्य तो आरंभ कर देते हैं पर विघ्नों से विचलित होकर उसे बीच में ही छोड़ देते हैं, परन्तु उत्तम श्रेणी के पुरुष बार-बार विघ्न आने पर भी प्रारंभ किये गये कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं छोड़ते हैं।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
posted Feb 24 by anonymous

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निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः स्थिरा भवतु गच्छतु वा यथेष्टम्। अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥ *Worldly-wise may insult or praise, wealth may come or go by itself, they may die today or may live for hundred years but men of patience never divert from the path of justice. *नीति में निपुण मनुष्य चाहे निंदा करें या प्रशंसा, लक्ष्मी आयें या इच्छानुसार चली जायें, आज ही मृत्यु हो जाए या युगों के बाद हो परन्तु धैर्यवान मनुष्य कभी भी न्याय के मार्ग से अपने कदम नहीं हटाते हैं।* *हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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सुखस्य दुःखस्य न कोSपि दाता परोददातीति कुबुद्धिरेषा | अहं करोमीति वृथाSभिमानः स्वकर्मसूत्र ग्रथितो हि लोक: || It is the wrong perception that pain or pleasure are provided to us by others. Pleasure and pain are not to given to us by someone else. It is equally vain glorious to claim that I am the doer of anything. The life in the world is arranged by the karmas one has practiced and is practicing. *हमारे सुख दु:ख दूसरों ने दिये है ये समझना गलत है । ये भी समझना गलत है कि मैं ही सब कार्य करता हुँ । सभी लोग अपने कर्मो के फल भुगतते हैं।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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उदये सविता रक्तो रक्त:श्चास्तमये तथा। सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥ The sun looks red while rising and setting. Great men too remain alike in both the good and bad times. *उदय होते समय सूर्य लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल होता है, सत्य है महापुरुष सुख और दुःख में समान रहते हैं॥* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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कस्यैकान्तं सुखम् उपनतं, दु:खम् एकान्ततो वा। नीचैर् गच्छति उपरि च, दशा चक्रनेमिक्रमेण॥ Who has only experienced constant happiness or constant sorrows? Situations in life are similar to a point on the moving wheel which goes up and down regularly. *किसने केवल सुख ही देखा है और किसने केवल दुःख ही देखा है, जीवन की दशा एक चलते पहिये के घेरे की तरह है जो क्रम से ऊपर और नीचे जाता रहता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते | संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते || While contemplating the objects of the senses, a person develops attachment for them, and from such attachment lust develops, and from lust anger arises *विषयों का ध्यान करने से उनके प्रति आसक्ति हो जाती है यह आसक्ति ही कामना को जन्म देती है और कामना ही क्रोध को जन्म देती है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।
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