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भोजन सम्बन्धी कुछ नियम ...

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1- पांच अंगो ( दो हाथ , 2 पैर , मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे ! 2. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है ! 3. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है ! 4. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए ! 5. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है ! 6 . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है ! 7. शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए ! 8. मल मूत्र का वेग होने पर , कलह के माहौल में , अधिक शोर में , पीपल ,वट वृक्ष के नीचे , भोजन नहीं करना चाहिए ! 9 परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए ! 10. खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के ,उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए ! 11. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से , मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले 3 रोटिया अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घरवालो को खिलाये ! 12. इर्षा , भय , क्रोध , लोभ , रोग , दीन भाव , द्वेष भाव , के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है ! 13. आधा खाया हुआ फल , मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए ! 14. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए ! 15. भोजन के समय मौन रहे ! 16. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए ! 17. रात्री में भरपेट न खाए ! 18. गृहस्थ को 32 ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए ! 19. सबसे पहले मीठा , फिर नमकीन ,अंत में कडुवा खाना चाहिए ! 20. सबसे पहले रस दार , बीच में गरिस्थ , अंत में द्राव्य पदार्थ ग्रहण करे ! 21. थोडा खाने वाले को --आरोग्य ,आयु , बल , सुख, सुन्दर संतान , और सौंदर्य प्राप्त होता है ! 22. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए ! 23. कुत्ते का छुवा ,रजस्वला स्त्री का परोसा , श्राध का निकाला , बासी , मुह से फूक मारकर ठंडा किया , बाल गिरा हुआ भोजन ,अनादर युक्त , अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे ! 24. कंजूस का , राजा का , वेश्या के हाथ का , शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए।...

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भोजन सम्बन्धी कुछ नियम ...
posted May 20 by Vaswati Baksiddha

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Thank you
Have a blessed days
Rajendraprasad N P Chaitanya ji
Thank you very much for your nice appreciation.
Lots of respect to you.

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21 जून को सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है। भारत में दिखने वाला यह एक मात्र सूर्य ग्रहण होगा। 26 दिसंबर 2019 के बाद भारत में करीब 6 महीने के बाद ही लंबा सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है। इस सूर्य ग्रहण का भी व्यापक असर देश और दुनिया पर दिखेगा। कई ज्योतिषियों का मानना है कि 2019 के ग्रहण से कोरोना महामारी का विस्तार हुआ और 2020 के ग्रहण से इसका समापन हो जाएगा। इस ग्रहण के दौरान सूर्य एक चमकीले छल्ले के समान दिखेगा। यह कंकण सूर्य ग्रहण सुबह 9 बजकर 15 मिनट 58 सेकंड पर शुरू हो जाएगा और दोपहर 3 बजकर 4 मिनट 1 सेकंड पर समाप्त होगा। यानी यह सूर्यग्रहण कुल 5 घंटे 48 मिनट और 3 सेकंड के लिए होगा। लेकिन इस सूर्यग्रहण का आरंभ और समापन का समय भारत में अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रहेगा। 21 जून आषाढ़ अमावस्या को लगने वाले सूर्य ग्रहण समय का सूतक काल ज्योतिषियों के अनुसार ग्रहण पर सूतक काल का विशेष ध्यान रखना चाहिए।सूतक काल 20 जून शनिवार रात 9:15 बजे से शुरू हो जाएगा इसी के साथ शहर के मठ-मंदिर के पट भी बंद हो जाएंगे। आपको बता देें कि ज्योतिषशास्त्री ग्रहण के ग्रहण के 12 घंटे पहले और 12 घंटे बाद तक के समय को सूतक काल मानते हैं। 21 जून को सूर्य ग्रहण दिन में 9:16 बजे शुरू होगा। इसका चरम दोपहर 12:10 बजे होगा। मोक्ष दोपहर में 3:04 बजे होगा।ज्योतिषियों की मानें तो सूर्यग्रहण में ग्रहण लगने से 12 घंटे पहले ही भोजन कर लेना चाहिए। बूढ़े, बालक, रोगी और गर्भवती महिलाएं डेढ़ प्रहर चार घंटे पहले तक खा सकते हैं । ग्रहण के बाद नया भोजन बना लेना चाहिए । सम्भव हो तो ग्रहण के पश्चात् घर में रखा सारा पानी बदल दें। कहा जाता है ग्रहण के बाद पानी दूषित हो जाता है। ग्रहण के कुप्रभाव से खाने-पीने की वस्तुएँ दूषित न हों इसलिए सभी खाद्य पदार्थों एवं पीने के जल में तुलसी का पत्ता अथवा कुश डाल दें। ग्रहण के समय पहने हुए एवं स्पर्श किए गए वस्त्र आदि अशुद्ध माने जाते हैं। अतः ग्रहण पूरा होते ही पहने हुए कपड़ों सहित स्नान कर लेना चाहिए। ग्रहण से 30 मिनट पूर्व गंगाजल छिड़क के शुद्धिकरण कर लें। ज्योतिषियों की मानें तो यह कंकण आकृति ग्रहण है। इसके साथ ही यह ग्रहण सूर्य भगवान के दिन रविवार को लग रहा है। इस ग्रहण का असर विभिन्न राशियों पर पड़ेगा। यह सूर्य ग्रहण देश के कुछ भागों में पूर्ण रूप से दिखाई देगा। मिथुन राशि पर लगने वाला सूर्य ग्रहण अत्यंत ही संवेदनशील होगा। मंगल का जलीय राशि मीन में होना शुभ नहीं माना जाता है। सूर्य बुध, चंद्रमा और राहु पर मंगल की दृष्टि पड़ना अशुभ माना जाता है। इस ग्रहण में बड़े-बड़े प्राकृतिक आपदा के संकेत बन रहे हैं। इसमें अतिवृष्टि चक्रवात तूफान महामारी आदि से जनजीवन अस्त-व्यस्त रहेगा।
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ग्रह-दशा फल नियम (1) ग्रह कब ? कैसे ? कितना ? फल देते हैं इस बात का निर्णय दशा अन्तर्दशा से किया जाता है। (2) दशा कई प्रकार की हैं, परन्तु सब में शिरोमणि विंशोत्तरी ही है। (3) सबसे पहले कुंडली में देखिये की तीनो लग्नों ( चंद्र लग्न, सूर्य लग्न, और लग्न ) में कौन- सी दो लग्नों के स्वामी अथवा तीनो ही लग्नों के स्वामी परस्पर मित्र हैं। कुंडली के शुभ अशुभ ग्रहों का निर्णय बहुमत से निश्चित लग्नों के आधार पर करना चाहिए । उदाहरण के लिए यदि लग्न कुंभ है; सूर्य धनु में चंद्र वृश्चिक में है तो ग्रहों के शुभ-अशुभ होने का निर्णय वृश्चिक अथवा धनु लग्न से किया जायेगा अर्थात गुरु, सूर्य, चंद्र और मंगल ग्रह शुभ अथवा योगकारक होंगे और शुक्र , बुध तथा शनि अनिष्ट फलदायक होंगे। (4) यदि उपर्युक्त नियमानुसार महादशा का ग्रह शुभ अथवा योगकारक बनता है तो वह शुभ फल करेगा । इसी प्रकार यदि अन्तर्दशा का ग्रह भी शुभ अथवा योगकारक बनता है तो फल और भी शुभ होगा। (5) स्मरण रहे की अन्तर्दशा के स्वामी का फल दशानाथ की अपेक्षा मुख्य है- अर्थात यदि दशानाथ शुभ ग्रह न भी हो परंतु भुक्तिनाथ शुभ है तो फल शुभ होगा। (6) यदि भुक्तिनाथ दशानाथ का मित्र हो और दशानाथ से शुभ भावों ( दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवें, दशवें और ग्यारहवें ) में स्थित हो तो और भी शुभ ही फल देगा। (7) यदि दशानाथ निज शुभ स्थान से भी अच्छे स्थान ( दूसरे, चौथे आदि ) में स्थित है तो और भी शुभ फल करेगा। (8) परंतु सबसे आवश्यक यह है की शुभ भुक्तिनाथ में अच्छा बल होना चाहिए। यदि शुभ भुक्तिनाथ केंद्र स्थान में स्थित है, उच्च राशि अथवा स्वक्षेत्र में स्थित है अथवा मित्र राशि में स्थित है और भाव मध्य में है, किसी पापी ग्रह से युक्त या दृष्ट नहीं, बल्कि शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट है, वक्री है तथा राशि के बिलकुल आदि में अथवा बिल्कुल अंत में स्थित नहीं है, नवांश में निर्बल नहीं है , तो भुक्तिनाथ जिस शुभ भाव का स्वामी है उसका उत्तम फल करेगा अन्यथा यदि ग्रह शुभ भाव का स्वामी है परंतु छठे, आठवे, बारहवें आदि नेष्ट (अशुभ) स्थानों में स्थित है, नीच अथवा शत्रु राशि का है, पापयुक्त अथवा पापदृष्ट है, राशि के आदि अथवा अंत में है, नवांश में निर्बल है, भाव संधि में है, अस्त है, अतिचारी है तो शुभ भाव का स्वामी होता हुआ भी बुरा फल करेगा। (9) जब तिन ग्रह एकत्र हों और उनमे से एक नैसर्गिक पापी तथा अन्य दो नैसर्गिक शुभ हों और यदि दशा तथा भुक्ति नैसर्गिक शुभ ग्रहों की हो तो फल पापी ग्रह का होगा। उदाहरण के लिए यदि लग्न कर्क हो , मंगल, शुक्र तथा गुरु एक स्थान में कहीं हों, दशा गुरु की भुक्ति शुक्र की हो तो फल मंगल का होगा। यह फल अच्छा होगा क्यों की मंगल कर्क लग्न वालों के लिए योगकारक होता है। (10) जब दशानाथ तथा भुक्तिनाथ एक भाव में स्थित हों तो उस भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं (11) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ एक ही भाव को देखते हों तो दृष्ट भाव सम्बन्धी घटनाये देते हैं। (12) जब दशानाथ तथा भुक्ति नाथ परस्पर शत्रु हों, एक दूसरे से छठे, आठवें स्थित हों और भुक्तिनाथ लग्न से भी छठे , आठवें, बारहवें स्थित हो तो जीवन में संघर्ष, बाधायें, विरोध, शत्रुता, स्थान च्युति आदि अप्रिय घटनाएं घटती हैं। (13) लग्न से दूसरे, चौथे, छठे, आठवें, ग्यारहवें तथा बारहवें भावों के स्वामी अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देते हैं यदि महादशा नाथ स्वामी इनमे से किसी भाव का स्वामी होकर इन्ही में से किसी अन्य के भाव में स्थित हो अपनी महादशा में रोग देने को उद्धत होगा ऐसा ही भुक्ति नाथ के बारे में समझना चाहिए। ऐसी दशा-अन्तर्दशा आयु के मृत्यु खंड में आये तो मृत्यु हो जाती है। (14) गुरु जब चतुर्थ तथा सप्तम अथवा सप्तम तथा दशम का स्वामी हो तो इसको केंद्राधिपत्य दोष लगता है। ऐसा गुरु यदि उपर्युक्त द्वितीय, षष्ठ आदि नेष्ट भावों में निर्बल होकर स्थित हो अपनी दशा भुक्ति में शारीरिक कष्ट देता है। (15) राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। इनका स्वतंत्र फल नहीं है। ये ग्रह यदि द्वितीय, चतुर्थ, पंचम आदि शुभ भावों में स्थित हों और उन भावों के स्वामी भी केंद्रादि स्थिति तथा शुभ प्रभाव के कारण बलवान हों तो ये छाया ग्रह अपनी दशा भुक्ति में शुभ फल देते हैं। (16) राहु तथा केतु यदि शुभ अथवा योगकारक ग्रहों के प्रभाव में हों और वह प्रभाव उनपर चाहे युति अथवा दृष्टि द्वारा पड़ रहा हो तो छाया ग्रह अपनी दशा- अन्तर्दशा में उन शुभ अथवा योगकारक ग्रहों का फल करेंगे
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चन्द्र मन का कारक होता है। इसका प्रभाव प्रत्येक चराचर जीव पर पड़ता है। मानव शरीर ही क्या सभी जीवों में जल की मात्रा सर्वाधिक होती है। यह जल भी चन्द्र की वजह से ही प्रभावित होता है । चन्द्र का अशुभ प्रभाव सभी पर पड़ता है। विशेषकर अगर जन्मकुडंली में चन्द्र अशुभ हो तो मन-मस्तिष्क पर असर पड़ता है। लेकिन मानव ही ऐसा प्राणी है जो बचने के उपाय कर सकता है। शुभ-अशुभ प्रभाव को समझ सकता है एवं अशुभ प्रभाव को दूर कर सकता है। मानसिक अशांति, दुधारू पशु का दूध सूख जाना, अत्यधिक प्यास लगना, गर्मी का मौसम ना हो तब भी बार-बार पानी की कमी महसूस होना। शरीर में जलन होना जैसी स्थिति कमजोर चन्द्र के कारण होती है। कुंडली में चन्द्र किस स्थान पर बैठा है, किन ग्रहों के साथ बैठा है और किस राशि का होकर बैठा है। इन सब बातों का जातक पर प्रभाव पड़ता है। चन्द्र संबंधी कुछ विशेष तथ्य प्रस्तुत है। इन पर ध्यान देकर चन्द्र की अशुभ स्थिति को सुधारा जा सकता है और उसकी शुभता में वृद्धि भी की जा सकती है। केमद्रुम योग को दरिद्रतादायक योग कहा गया है| जब जन्मांग में चन्द्र के साथ (युति) अथवा उस से द्वितीय व द्वादश स्थान में कोई ग्रह ना हो एवं चन्द्र से दशम कोई ग्रह स्थित ना हो या चंद्र को कोई शुभ ग्रह देखता न हो तो दरिद्रतादायक "केमद्रुम योग" बनता है। केमद्रुम योग के संदर्भ में छाया ग्रह राहु केतु की गणना नहीं की जाती है| यह एक अत्यंत अशुभ योग है। इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य चाहे इन्द्र का प्रिय पुत्र ही क्यों ना हो वह अंत में दरिद्री होकर भिक्षा मांगता है। "कान्तान्नपान्ग्रहवस्त्रसुह्यदविहीनो, दारिद्रयदुघःखगददौन्यमलैरूपेतः। प्रेष्यः खलः सकललोकविरूद्धव्रत्ति, केमद्रुमे भवति पार्थिववंशजोऽपि॥" अर्थात- यदि केमद्रुम योग हो तो मनुष्य स्त्री, अन्न, घर, वस्त्र व बन्धुओं से विहीन होकर दुःखी, रोगी, दरिद्री होता है चाहे उसका जन्म किसी राजा के यहां ही क्यों ना हुआ हो। केमद्रुम योग में जन्म लेनेवाला व्यक्ति निर्धनता एवं दुख को भोगता है, आर्थिक दृष्टि से वह गरीब होता है. आजिविका संबंधी कार्यों के लिए परेशान रह सकता है | मन में भटकाव एवं असंतुष्टी की स्थिति बनी रहती है. व्यक्ति हमेशा दूसरों पर निर्भर रह सकता है| पारिवारिक सुख में कमी और संतान द्वारा कष्ट प्राप्त कर सकता है, ऐसे व्यक्ति दीर्घायु होते हैं| इस योग के विषय में जातक पारिजात नामक ग्रन्थ में कहा गया हैं कि - योगे केमद्रुमे प्रापो यस्मिन कश्चि जातके । राजयोगा विशशन्ति हरि दृष्टवां यथा द्विषा: ।। अर्थात— जन्म के समय यदि किसी कुंडली में केमद्रुम योग हो और उसकी कुंडली मैं सेकड़ो राजयोग भी हो तो वह भी विफल हो जातें हैं । अर्थात केमद्रुम योग अन्य सैकड़ों राजयोगो का प्रभाव उसी प्रकार समाप्त कर देता हैं , जिस प्रकार जंगल में सिंह हाथियों का प्रभाव समाप्त कर देता हैं । “केमद्रुम” योग के विषय में कहा गया है क़ि- “केमद्रुमे भवति पुत्र कलत्र हीनो देशान्तरे ब्रजती दुःखसमाभितप्तः । ज्ञाति प्रमोद निरतो मुखरो कुचैलो नीचः भवति सदा भीतियुतश्चिरायु ॥” अर्थात जिसकी कुंडली में केमद्रुम योग होता है वह पुत्र कलत्र से हीन इधर उधर भटकने वाला, दुःख से अति पीड़ित, अल्पबुद्धि एवं दुखी, मलिन वस्त्र धारण करने वाला, नीच एवं कम उम्र वाला होता है|” वेदों में कहा गया है क़ि “ चन्द्रमा मनसो जाताश्चक्षो सूर्यो अजायत ” चन्द्रमा का मन से घनिष्ठ सम्बन्ध है, कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा मानसिक शान्ति का कारक ग्रह है | अशुभ ग्रहो से दृष्ट होने पर चन्द्रमाँ नकारात्मक विचारों को जन्म देता है | केमद्रुम योग के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह योग संघर्ष और अभाव ग्रस्त जीवन देता है| इसीलिए ज्योतिष के अनेक विद्वान इसे दुर्भाग्य का सूचक कहते हैं | परंतु लेकिन यह अवधारणा पूर्णतः सत्य नहीं है| केमद्रुम योग से युक्त कुंडली के जातक कार्यक्षेत्र में सफलता के साथ- साथ यश और प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं| वस्तुतः अधिकांश विद्वान इसके नकारात्मक पक्ष पर ही अधिक प्रकाश डालते हैं| यदि इसके सकारात्मक पक्ष का विस्तार पूर्वक विवेचन करें तो हम पाएंगे कि कुछ विशेष योगों की उपस्थिति से केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में परिवर्तित हो जाता है, इसलिए किसी जातक की कुंडली देखते समय केमद्रुम योग की उपस्थिति होने पर उसको भंग करने वाले योगों पर ध्यान देना आवश्यक है तत्पश्चात ही फलकथन करना चाहिए| जब कुण्डली में लग्न से केन्द्र में चन्द्रमा या कोई ग्रह हो तो केमद्रुम योग भंग माना जाता है, योग भंग होने पर केमद्रुम योग के अशुभ फल भी समाप्त होते है| कुण्डली में बन रही कुछ अन्य स्थितियां भी इस योग को भंग करती है, जैसे चंद्रमा सभी ग्रहों से दृष्ट हो या चंद्रमा शुभ स्थान में हो या चंद्रमा शुभ ग्रहों से युक्त हो या पूर्ण चंद्रमा लग्न में हो या चंद्रमा दसवें भाव में उच्च का हो या केन्द्र में चंद्रमा पूर्ण बली हो अथवा कुण्डली में सुनफा, अनफा या दुरुधरा योग बन रहा हो, तो केमद्रुम योग भंग हो जाता है| यदि चन्द्रमा से केन्द्र में कोई ग्रह हो तब भी यह अशुभ योग भंग हो जाता है और व्यक्ति इस योग के प्रभावों से मुक्त हो जाता है | कुछ अन्य शास्त्रों के अनुसार- यदि चन्द्रमा के आगे- पीछे केन्द्र और नवांश में भी इसी प्रकार की ग्रह स्थिति बन रही हो तब भी यह योग भंग माना जाता है| केमद्रुम योग होने पर भी जब चन्द्रमा शुभ ग्रह की राशि में हो तो योग भंग हो जाता है| शुभ ग्रहों में बुध्, गुरु और शुक्र माने गये है| ऎसे में व्यक्ति संतान और धन से युक्त बनता है तथा उसे जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है| केमद्रुम योग को भंग करने वाले प्रमुख योग निम्नलिखित हैं। 1. चंद्रमा पर बुध या गुरु की पूर्ण दृष्टि हो अथवा लग्न में बुध या गुरु की स्थिति या दृष्टि हो। 2. चंद्रमा और गुरु के मध्य भाव-परिवर्तन का संबंध बन रहा हो। 3. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी चंद्रमा पर दृष्टि डाल रहा हो। 4. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी लग्न में स्थित हो। 5. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी गुरु से दृष्ट हो। 6. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी चंद्रमा से भाव परिवर्तन का संबंध बना रहा हो। 7. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी लग्नेश, पंचमेश, सप्तमेश या नवमेश के साथ युति या दृष्टि संबंध बना रहा हो। 8. लग्नेश, पंचमेश, सप्तमेश और नवमेश में से कम से कम किन्ही दो भावेशों का आपस में युति या दृष्टि संबंध बन रहा हो। 9. लग्नेश बुध या गुरु से दृष्ट होकर शुभ स्थिति में हो। 10. चंद्रमा केंद्र में स्वराशिस्थ या उच्च राशिस्थ होकर शुभ स्थिति में हो। सोमवार को पूर्णिमा के दिन अथवा सोमवार को चित्रा नक्षत्र के समय से लगातार चार वर्ष तक पूर्णिमा का व्रत रखें| सोमवार के दिन भगवान शिव के मंदिर जाकर शिवलिंग पर गाय का कच्चा दूध चढ़ाएं व पूजा करें| भगवान शिव ओर माता पार्वती का पूजन करें| रूद्राक्ष की माला से शिवपंचाक्षरी मंत्र ” ऊँ नम: शिवाय” का जप करें ऎसा करने से केमद्रुम योग के अशुभ फलों में कमी आएगी| घर में दक्षिणावर्ती शंख स्थापित करके नियमित रुप से श्रीसूक्त का पाठ करें| दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर उस जल से देवी लक्ष्मी की मूर्ति को स्नान कराएं तथा चांदी के श्रीयंत्र में जन्म पत्रिका में चन्द्र की स्थिती के अनुसार मोती धारण करके उसे सदैव अपने पास रखें या धारण करें|
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ज्योतिष की दृष्टि में राहु ********************* राहु :यह एक छाया ग्रह । गले के ऊपरी भाग पर राहु का बाकी नीचे का केतु का स्वामित्व या अधिकार है कन्या राशि :स्वराशि। मिथुन राशि में उच्च व धनु में नीच का होता है। मित्र ग्रह :शनि, बुध व शुक्र । शत्रु ग्रह :सूर्य, चंद्र, मंगल व गुरु । तामसिक ग्रह। कारक तत्वों : मतिभ्रम, छल-कपट, झूठ बोलना, चोरी, तामसिक भोजन, षड्यंत्र, छिपे शत्रु, अनैतिक कर्म, आकस्मिकता, नकारात्मक सोच, शुभ फलकारक:शनि, शुक्र ,बुध के लग्नेश होने पर मित्रता के कारण राहु शुभफल कारक शत्रु फलकारक: सूर्य, चंद्र, मंगल व चंद्रमा के लग्नेश होने के कारण कुछ अशुभ राहु की भावफलदायक : जन्मकुंडली में तृतीय, षष्ठ व एकादश भाव में राहु उत्तम फलदायक रहता है। अच्छा फलदायक : 1,लग्न, 5,पंचम,9, नवम, 10,दशम भाव में। मध्यम फलदायक :2,द्वितीय व 7, सप्तम में 4, चतुर्थ । अनिष्टकारक :8,अष्टम व12, द्वादश भाव । फलादेश के लिये : राहु मित्र ग्रह की राशि में है या शत्रु की राशि में। राहु किसी भी भाव में शत्रु राशि में हो उस भाव की हानि करेगा और यदि मित्र राशि में है तो सहायक होगा। ग्रहों से युति का फल: राहु सूर्य युति : पिता का सुख नहीं मिलेगा, या कमज़ोर होगा पुत्र सुख में भी कमी होगी, प्रसिद्धि व प्रतिष्ठा मे कमी , आत्मविश्वास मे कमी , यश मे कमी । राहु चंद्रमा युति : माता के सुख मे कमी मानसिक रूप से अशांत। एकाग्रता की कमी।. अवसाद में आना । चिंता करना । व्याकुलता व घबराहट से परेशान। राहु मंगल युति : अनिष्टकारी ,क्रोधी व अहंकारी होती है। दुर्घटना, शत्रु बाधा ,लड़ाई झगड़े । वैवाहिक जीवन में समस्याएं । राहु बुध युति : निर्णय क्षमता में कमी। शिक्षा में उतार-चढ़ाव। अगर 2 हाउस में हो तब वाणी दोष भी बनता है परिवार से दूरी बनेंगी राहु गुरु युति : गुरु चांडाल दोष बनता है । विवेक में कमी, शिक्षा में बाधा । संतान सुख में बाधायें। प्रतिभा कम होती है। उन्नति में भी बाधायें। राहु शुक्र युति : तामसिक विलासिता शराब औऱ अन्य नशे की आदत। प्रेम-विवाह, अन्तर्जातीय विवाह भी हो सकता है। राहु शनि युति : आकस्मिक लाभ भी हो सकता है। चतुराई से लाभ। पर आजीविका में कुछ संघर्ष । राहु की महादशा का फल: अनिष्टकारक होगी या शुभ कारक। ******************************* राहु अशुभ स्थिति में है तो निश्चित ही अनिष्टकारी होगा। शुभ स्थिति में होने पर उतना ही आकस्मिक लाभ करायेगा।जीवन में सभी सुख सुविधाएँ होंगी कुंडली में राहु 4,चतुर्थ, 8,अष्टम या 12,यानी द्वादश भाव में स्थित है तो राहु की दशा अशुभ फल कारक होगी। कुंडली के अकारक ग्रहों 6, षष्ठेश, 8,अष्टमेश व 12,द्वादशेश भाव के मालिकों से द्रस्तिगत या युत राहु भी अशुभ फलकारक होगा। जैसे ग्रहों के प्रभाव में होगा वैसा ही फल करेगा। कुंडली में राहु 3,तृतीय, 6षष्ठ व 11, एकादश भाव में है तो अपनी दशा में शुभकारक होगा। अगर 1,5,9,11 यानी लग्न, पंचम, नवम, दशम भाव में भी शुभ है। कुंडली के शुभकारक ग्रह1,5,9 यानी लग्नेश, पंचमेश व नवमेश से दृष्ट या युत राहु दशा में शुभ फलकारक होगा। कुंडली में राहु अशुभ स्थिति में है तो उसकी दशा में , मन में अशांति , मन चलायमान , व्यक्ति मतिभ्रम , गलत निर्णय ,कर्म तथा लक्ष्य से भटकना , बुरी आदतों का शिकार,बड़ों का कहना न मानना , लापरवाही के कारण असफलता आदि होगा । राहु शुभ स्थिति में है तो ऐसे राहु की दशा में व्यक्ति को आकस्मिक लाभ अवश्य होते हैं तथा व्यक्ति थोड़े समय में ही अप्रत्याशित उन्नति कर लेता है और सभी रूके कार्य इस समय में स्वतः ही पूरे हो जाते हैं। राहु के अनिष्ट फल से बचने के उपाय: ऊँ रां राहवे नमः का प्रतिदिन एक माला जाप करें। दुर्गा चालीसा का पाठ करें। पक्षियों को बाजरा खिलायें । धान्य का दान करते रहें। शिवलिंग को जलाभिषेक करें। र्नैत्य कोण S/ W दिशा में पीले रंग के फूल लगाना ठीक रहता है । तामसिक आहार व नशा नही करना चाहिए । पहली मुफ्त सलाह के लिए गिफ्ट कोड FS16 से मोबाइल ऐप में रजिस्टर करे , वीडियो देखे https://youtu.be/3rBsGaSvEdI योगा, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सक, ज्योतिष विद्वान, मनोवैज्ञानिक ,कानूनी सलाहकार , कैरियर सलाहकार, चार्टर्ड अकाउंटेंट, बिजनेस कंसलटेंट या अन्य कोई मानवता के काम आने वाली विशेष योग्यता रखते हैं ऐसे विद्वानों से फ्यूचर स्टडी ऑनलाइन द्वारा प्रस्तुत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विश्व के किसी भी कोने से व्यक्ति सलाह लेकर जीवन को लाभान्वित कर सकते हैं । सशुलक सलाह के लिए ऐप लिंक से डाऊनलोड करें https://play.google.com/store/apps/details?id=futurestudyonline.vedicjyotishvidyapeeth&hl=en या वेबसाइट में रजिस्टर करे। फोन द्वारा कोई भी व्यक्ति विद्वान सलाहकार से अपने लिए मार्गदर्शन ले सकता है । http://www.futurestudyonline.com जय श्री राम
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