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बहुत लोग गलत समय कोई रिस्की काम करके नुकसान खा रहे हैं

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जब कुंडली में छठे ,आठवें,बारहवें भाव की दशा अंतर्दशा चल रही है या छठे आठवें बारहवें भाव में बैठे ग्रहों की दशा चल रही हो तो आप किसी भी प्रकार का कोई इन्वेस्टमेंट करते हैं तो उसमें अवश्य नुकसान होता है इसलिए समय रहते जान लें कि कौन सा काम कब करना है नहीं करना है अन्यथा पछतावे के अलावा कुछ भी नहीं है जन्मपत्रिका में कौन सा ग्रह आपको सर्वाधिक लाभ दे सकता है या कौन सा ग्रह आपका सबसे ज्यादा नुकसान कर सकता है यह भी जरूरी है जानना बहुत समय आदमी को यह भी नहीं पता होता कि उसे किस क्षेत्र में सफलता मिलेगी इसके लिए जरूर फ्यूचर स्टडी ऑनलाइन के भी दोनों से कंसल्टेशन बुक करके पूरी जानकारी लेनी चाहिए

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खराब दशा में नुकसान
posted Jun 27 by Rakesh Periwal

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इस संसार में अपने सपनों का घर ख़रीदना हर किसी की ख़्वाहिश होती है। आपका यह ख़्वाब कब पूरा होगा? आप यह ज्योतिष शास्त्र की मदद से जान सकते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार हमारी जन्म कुंडली में घर, ज़मीन या प्रॉपर्टी ख़रीदने जैसे विशेष मामलों का भी पता चलता है। ग्रहों व नक्षत्रों का योग हमें इस बात का संकेत करते हैं। विशेषकर ज्योतिषीय दशा पद्धति एवं ग्रहों की अनुकूल चाल से इन चीज़ों को ज्ञात किया जाता है। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार घर, ज़मीन या अन्य प्रकार की अचल संपत्ति को ख़रीदने के लिए जातक की कुण्डली में चतुर्थ भाव बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भाव इन चीज़ों को ख़रीदने के शुभ समय की सही व्याख्या करता है। जन्मपत्री में चौथा भाव मानसिक शांति, ख़ुशी, माता, घरेलू जीवन, रिश्तेदार, घर, आत्म समृद्धि, आनंद, वाहन, ज़मीन, पैतृक संपत्ति, शिक्षा आदि को प्रदर्शित करता है। इसको लेकर कुछ मुख्य तथ्य इस प्रकार है :- यदि जन्म पत्रिका में चतुर्थ भाव का स्वामी, प्रथम भाव के स्वामी के साथ हो और त्रिकोण अथवा केन्द्र भाव में स्थित हो तो, यह स्थिति जातक के लिए एक से अधिक घर अथवा प्रॉपर्टी ख़रीदने का संकेत करती है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध ग्रह तृतीय भाव में हो और चौथे भाव का स्वामी शुभ स्थिति में हो तो उस जातक के लिए यह स्थिति आकर्षक घर ख़रीदने की होती है। यदि कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी अपनी ही राशि अथवा नवांश में हो और उसकी राशि उच्च स्थिति में तो यह अवस्था जातक को एक आरामदेह घर या प्रॉपर्टी दिलाती है। यदि कुंडली के चतुर्थ भाव में ग्रह उच्च अवस्था में तो जातक एक से अधिक घरों एवं ज़मीन जायदादों का मालिक बनता है। यदि कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी मित्र राशि या स्वयं की राशि में स्थित हो अथवा बलित हो तो यह अवस्था किसी जातक को आरामदेह घर, वाहन, ज़मीन आदि दिलाती है। नवम भाव का स्वामी केन्द्र में हो और चतुर्थ भाव का स्वामी अपनी मित्र राशि में स्थित हो या फिर चतुर्थ भाव में ग्रह का उच्च होना सुंदर घर दिलाता है। यदि किसी की जन्म कुण्डली में चतुर्थ भाव का स्वामी मंगल/शनि/शुक्र के साथ शुभ योग में हो तो यह स्थिति जातक को एक से अधिक सुंदर घरों को ख़रीदने का संकेत करती है। बृहस्पति, मंगल, शनि एवं शुक्र ग्रह की महादशा प्रॉपर्टी ख़रीदने के लिए शुभ होती है। घर, ज़मीन अथवा अन्य संपत्ति ख़रीदने में ग्रहों की भूमिका मंगल: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल ग्रह ज़मीन का नैसर्गिक कारक होता है। शनि: ज्योतिष विज्ञान में शनि को ज़मीन अथवा प्रॉपर्टी के लिए दूसरा कारक ग्रह बताया गया है। शुक्र: वैदिक ज्योतिष के अनुसार शुक्र ग्रह समृद्धि का कारक होता है। यदि इसकी कृपा हुई तो यह किसी भी जातक को सुंदर और आकर्षक घर दिला सकता है। वहीं शनि और मंगल आपको घर तो दिला सकते हैं परंतु उनकी साज-सज्जा के लिए इंटिरियर कार्य की आवश्यकता होती है जिसका कारक शुक्र ग्रह होता है। जैसा कि हमने आपको बताया है मंगल ग्रह ज़मीन का प्राकृतिक कारक होता है। लेकिन जिस स्थान पर आप रहते हैं उसके लिए मंगल और शुक्र ग्रह की जिम्मेदार होती है। घर, ज़मीन अथवा अन्य प्रॉपर्टी ख़दीरने में विभिन्न भाव का महत्व प्रथम भाव : ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्म कुण्डली में प्रथम भाव जातक के शारीरिक स्वभाव और उसके व्यक्तित्व को दर्शाता है। इस भाव से आपके मन में अपने घर अथवा संपत्ति को लेकर विचार बनते हैं। द्वितीय भाव : जन्मपत्रिका में दूसरा भाव धन एवं धन की बचत को दिखाता है। बिना धन के नई प्रॉपर्टी आदि को ख़रीदना संभव नहीं है। चतुर्थ भाव: कुंडली में यह भाव व्यक्ति की ख़ुशियों और उसके घर-मकान को दर्शाता है। इसलिए घर या प्रॉपर्टी ख़रीदने के लिए कुंडली में चतुर्थ भाव और इसके स्वामी की परिस्थिति को देखा जाता है। एकादश भाव: हिन्दू ज्योतिष के अनुसार जन्म कुंडली में ग्यारहवें भाव से किसी भी जातक की आय और लाभ के बारे में पता चलता है। यदि यह भाव हमारे लिए अनुकूल परिणामकारी हो तो इससे हमारी आय में वृद्धि और धन का लाभ होता है। वहीं धन से हम अपनी प्रॉपर्टी को बढ़ा सकते हैं। ज्योतिष के अनुसार प्रॉपर्टी अथवा घर ख़रीदने का शुभ मुहूर्त महादशा को प्रॉपर्टी ख़रीदने के लिए बहुत महत्वपूर्ण समय माना जाता है। प्रॉपर्टी ख़रीदने के लिए चतुर्थ/द्वितीय/एकादश/नवम भाव के स्वामी एवं उनमें अवस्थित ग्रहों की महादशा शुभ होती है। व्यक्ति की मध्य आयु में सूर्य ग्रह घर ख़रीदने का बड़ा कारक माना जाता है। चंद्रमा व्यक्ति की प्रारंभिक आयु में घर दिलाने का बड़ा कारक होता है। मध्य आयु में घर ख़रीदने के लिए मंगल ग्रह सबसे बड़ा कारक होता है। बुध ग्रह 32 से 36 साल की आयु में घर प्राप्त करने का कारक होता है। गुरु को 30 की आयु में घर प्राप्त करने का कारक माना जाता है। शुक्र और राहु ग्रह की वजह से व्यक्ति को शुरुआती उम्र में घर मिलता है। शनि और केतु के कारण व्यक्ति को 44 से 52 की उम्र में घर मिलता है। ज्योतिष के अनुसार प्रॉपर्टी में हानि का कारण यदि कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी चतुर्थ भाव से द्वादश भाव में अवस्थित हो अवथा नीच भाव में हो तो प्रॉपर्टी में हानि होने की संभावना है। यदि कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी 6, 8 और 12 भाव में हो तो संपत्ति में नुकसान हो सकता है। यदि कुण्डली में चतुर्थ भाव का स्वामी नीच में हो , चतुर्थ भाव में ग्रह की अनुपस्थिति हो और शनि और मंगल कमज़ोर स्थिति में हो तो भी जातक को प्रॉपर्टी, जमीन आदि में हानि का सामना करना पड़ता है।
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गायत्री मंत्र के अलावा गायत्री के ये 24 मंत्र भी हैं https://youtu.be/_oeV-zVwxnw जिनमें हैं 24 देवताओं का वास, इन मंत्रों के जप से हो जाता हैं सभी कष्टों का नाश । भूत प्रेत, चोर डाकू, राज कोप, आशंका, भय, अकाल मृत्यु, रोग और अनेक प्रकार की बाधाओं का निवारण करके मनुष्य को सदैव तेजश्वी बनाय रखता है । इन मंत्रों को प्रतिदिन जपने से सुख, सौभाग्य, समृद्धि और ऎश्वर्य की होती हैं प्राप्ति । 1- गणेश गायत्री:- यह मंत्र समस्त प्रकार के विघ्नों का निवारण करने में सक्षम है । मंत्र- ।। ॐ एक दृष्टाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो बुद्धिः प्रचोदयात् ।। 2- नृसिंह गायत्री:- इस मंत्र से पुरषार्थ एवं पराक्रम की बृद्धि होती है । मंत्र- ।। ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात् ।। 3- विष्णु गायत्री:- यह मंत्र पारिवारिक कलह को समाप्त करता है । मंत्र- ।। ॐ नारायण विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु: प्रचोदयात् ।। 4- शिव गायत्री:- यह मंत्र सभी प्रकार का कल्याण करने में अद्भूत कार्य कर्ता है । मंत्र- ।। ॐ पंचवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्र: प्रचोदयात् ।। 5- कृष्ण गायत्री:- यह मंत्र कर्म क्षेत्र की सफलता हेतु बड़ा ही लाभकारी है । मंत्र- ।। ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात् ।। 6- राधा गायत्री:- यह मंत्र प्रेम का अभाव दूर करके पूर्णता प्रदान करता है । मंत्र- ।। ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि। तन्नो राधा प्रचोदयात् ।। 7- लक्ष्मी गायत्री:- यह मंत्र पद प्रतिष्ठा, यश ऐश्वर्य और धन सम्पति प्रदान करता हैं मंत्र- ।। ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।। 8- अग्नि गायत्री:- यह मंत्र इंद्रियों की तेजस्विता को बढ़ाता है । मंत्र- ।। ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि। तन्नो अग्नि: प्रचोदयात् ।। 9- इन्द्र गायत्री:- यह मंत्र दुश्मनों के हमले से बचाता है । मंत्र- ।। ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि। तन्नो इन्द्र: प्रचोदयात् ।। 10- सरस्वती गायत्री:- इस मंत्र से ज्ञान बुद्धि की वृद्धि होती है एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है । मंत्र- ।। ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात् ।। 11- दुर्गा गायत्री:- यह मंत्र दुखः, पीड़ा ही नहीं शत्रुओं का नाश, विघ्नों पर विजय दिलाता हैं । मंत्र- ।। ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ।। 12- हनुमान गायत्री:- यह मंत्र कर्म के प्रति निष्ठा की भावना जागृत करता हैं । मंत्र- ।। ॐ अंजनी सुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि। तन्नो मारुति: प्रचोदयात् ।। 13- पृथ्वी गायत्री:- यह मंत्र दृढ़ता, धैर्य और सहिष्णुता की वृद्धि करता है । मंत्र- ।। ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्त्रमूत्यै धीमहि। तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात् ।। 14- सूर्य गायत्री:- इस मंत्र से शरीर के सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है । मंत्र- ।। ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि । तन्नो सूर्य: प्रचोदयात् ।। 15- राम गायत्री:- इस मंत्र से मान प्रतिष्ठा बढती है । मंत्र- ।। ॐ दशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि। तन्नो राम: प्रचोदयात् ।। 16- सीता गायत्री:- यह मंत्र तप की शक्ति में वृद्धि करता है । मंत्र- ।। ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि। तन्नो सीता प्रचोदयात् ।। 17- चन्द्र गायत्री:- यह मंत्र निराशा से मुक्ति दिलाता है और मानसिकता भी प्रबल होती है । मंत्र- ।। ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्त्वाय धीमहि। तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात् ।। 18- यम गायत्री:- इस मंत्र से मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । मंत्र- ।। ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि । तन्नो यम: प्रचोदयात् ।। 19- ब्रह्मा गायत्री:- इस मंत्र से व्यापारिक संकट दूर हो जात है । मंत्र- ।।ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारुढ़ाय धीमहि। तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ।। 20- वरुण गायत्री:- यह मंत्र व्यक्ति के भीतर प्रेम भावना जागृत करता है, जिससे भावनाओं का उदय होता हैं । मंत्र- ।। ॐ जलबिम्वाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि। तन्नो वरुण: प्रचोदयात् ।। 20- नारायण गायत्री:- यह मंत्र प्रशासनिक प्रभाव बढ़ता है । मंत्र- ।। ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो नारायण: प्रचोदयात् ।। 22- हयग्रीव गायत्री:- यह मंत्र समस्त भयो का नाश करता है । ।। ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि । तन्नो हयग्रीव: प्रचोदयात् ।। 23- हंस गायत्री:- इस मंत्र से विवेक शक्ति का विकाश होता है, बुद्धि भी प्रखर होती है । मंत्र- ।। ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि। तन्नो हंस: प्रचोदयात् ।। 24- तुलसी गायत्री:- इस मंत्र से परमार्थ की भावना जाग्रत होती हैं । ।। ॐ श्रीतुलस्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् । गायत्री साधना का प्रभाव तत्काल होता है जिससे साधक को आत्मबल की प्राप्ति होती है और मानसिक कष्ट में तुरन्त शान्ति मिलती है । इस महामन्त्र के प्रभाव से आत्मा में सतोगुण बढ़ता है । गायत्री की महिमा के सम्बन्ध में कहा गया हैं कि ब्रह्म की जितनी भी महिमा है, वह सब गायत्री की भी मानी जाती हैं । वेदमाता गायत्री सभी की दुर्बुद्धि को मिटाकर सबको सद्बुद्धि प्रदान करने वाली हैं www.futurestudyonline.com
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मान्यता है कि आश्विन अमावस्या के दिन ही पितृपक्ष का समापन होता है इसलिए इस दिन पितरों की पूजा का बेहद महत्व बताया गया है। इस दिन किसी भी पवित्र नदी, जलाशय, या कुंड में स्नान किया जाता है। इसके बाद सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है और उसके बाद पितरों के निमित्त तर्पण आदि किया जाता है।  इसके बाद शाम के समय दीपक जलाया जाता है और पूड़ी और अन्य खाने की वस्तुएं दरवाजे पर रखी जाती हैं। ऐसा करने के पीछे मान्यता है कि, वापस अपने लोक लौटते वक्त हमारे पितृ भूखे ना रहे और दीपक की रोशनी में उन्हें वापस अपने लोक जाने का रास्ता साफ साफ नजर आए।  इसके अलावा अगर आपको अपने किसी पितृ के श्राद्ध की तिथि याद ना हो तो आज के दिन उनका श्राद्ध भी किया जा सकता है। अगर आप पूरे श्राद्ध पक्ष में अपने पितरों का तर्पण नहीं कर पाए हैं तो आश्विन अमावस्या के दिन पितरों का तर्पण कर सकते हैं। इस दिन भूले-भटके पितरों के नाम से किसी भी जरूरतमंद को अपनी यथाशक्ति के अनुसार भोजन कराएं तो पुण्य मिलता है।  आश्विन अमावस्या महत्व   पितरों के पूजन के लिए आश्विन अमावस्या/सर्वपितृ अमावस्या का बेहद महत्व बताया गया है। इस दिन को सर्व पितृ अमावस्या और महालय विसर्जन भी कहा जाता है। सिर्फ श्राद्ध कर्म ही नहीं इस दिन तांत्रिक दृष्टिकोण से भी इस दिन का बेहद महत्व होता है। आश्विन अमावस्या की समाप्ति पर अगले दिन से शारदीय नवरात्र शुरू हो जाती हैं। हालाँकि इस वर्ष अधिक मास के चलते नवरात्रि एक महीने बाद से शुरू होगी। श्राद्ध विधि  सर्वपितृ अमावस्या को सुबह स्नान आदि कर गायत्री मंत्र का जाप करते हुए सूर्य देव को जल अर्पित करें।  इसके बाद अपने पितरों के लिए शुद्ध भोजन तैयार करें।  पितरों के लिए बनाए जाने वाले भोजन में लहसुन और प्याज का इस्तेमाल ना करें।  इस दिन घर पर किसी विद्वान ब्राह्मण को बुलाए उन्हें भोजन कराएं और अपनी इच्छाशक्ति शक्ति से उन्हें दान दें।  इसके बाद शाम के समय 2, 5 या फिर 16 दीपक जलाएं।
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